घर हजारों किलोमीटर दूर था, और अगले दिन उसे देश के लिए मैदान में उतरना था।
उस सुबह उसने जो फैसला लिया, उसका जवाब किस्मत ने पूरे सात साल बाद, उसी मुल्क की जमीन पर दिया।
जगह थी जापान का हिरोशिमा।
जून का महीना। शुक्रवार की सुबह।
टीम की कप्तान रानी रामपाल ने पूछा था, क्या हुआ?
और उस बच्ची से इससे ज्यादा कुछ बोला ही नहीं गया।
तीन शब्द।
बस तीन शब्द।
यह किस्सा मीडिया रिपोर्ट में दुनिया ने पढ़ा है।
साथियों ने कहा, घर चली जाओ।
सबने यही कहा। और ठीक ही कहा।
बाप गया है। मैच तो आते-जाते रहेंगे।
पर उसने मना कर दिया।
फिर वह अपने डच कोच शोर्ड मारिन के पास गई।
उनसे जो कहा, वह बात बाद में उस वक्त के खेल मंत्री किरेन रिजिजू ने पूरे देश को बताई।
“मैं अपने पापा को गर्व महसूस कराना चाहती हूं। मैं यहीं रहकर खेलूंगी, ताकि इंडिया क्वालिफाई करे।”
सोचिए।
उन्नीस की उम्र।
अनजाना मुल्क। अनजानी भाषा।
और सीने में इतना बड़ा पत्थर।
शनिवार को सेमीफाइनल था। सामने चिली।
भारत 4-2 से जीता।
रविवार को फाइनल। सामने मेजबान जापान।
भारत 3-1 से जीता।
और टोक्यो ओलंपिक की उम्मीद जिंदा रह गई।
उस लड़की का नाम है लालरेमसियामी।
मिजोरम के कोलासिब की लालरेमसियामी।
पूरा नाम लंबा है, इसलिए आगे मैं उन्हें सियामी लिखूंगा।
अब जरा उसके घर चलते हैं।
पापा थे लालथानसांगा जोटे।
फौज में रहे। फिर खेती करने लगे।
मां लालजारमावी, घर संभालने वाली।
किसानों का एक छोटा सा परिवार।
सियामी ने एक बार बताया था कि उनके गांव में हॉकी कोई खास जाना-पहचाना खेल नहीं था। गिनती के लोग खेलते थे।
फिर भी बेटी किशोर उम्र में घर छोड़कर डेढ़ सौ किलोमीटर दूर थेनजावल की हॉकी अकादमी चली गई।
उस बाप के बारे में सोचिए।
जो खुद फौज की वर्दी पहन चुका था।
जिसकी बेटी पहाड़ों के पार हॉकी खेलने चली गई थी।
और जब वही बेटी देश के लिए सबसे बड़ा मैच खेलने जा रही थी, वह चला गया।
बिना यह देखे कि उसकी बेटी ने उस हफ्ते क्या कर दिखाया।
हिरोशिमा से लौटकर सियामी मंगलवार को कोलासिब पहुंचीं।
ईस्टमोजो नाम के अखबार ने उस दिन का हाल लिखा था।
बेटी को देखते ही मां टूट गईं। रोने लगीं।
और बेटी ने मुस्कुराते हुए मां को थाम लिया।
फिर सबके सामने खड़े होकर उन सबका शुक्रिया अदा किया, जो उस मुश्किल घड़ी में परिवार के साथ खड़े रहे।
पिता के जाने पर संवेदना के तौर पर उन्हें 10,000 रुपये मिले थे।
यहां मैं आपसे थोड़ी अलग बात करना चाहता हूं।
क्योंकि यह सीरीज मन की सेहत की है, सिर्फ जीत की नहीं।
हम सब ऐसी कहानी सुनते हैं और कहते हैं, वाह, क्या हिम्मत है।
हिम्मत है। इसमें कोई शक नहीं।
लेकिन एक सवाल मेरे मन में बार-बार आता है।
उस रात होटल के कमरे में क्या हुआ होगा?
जब मैच खत्म हो गया। जब तालियां थम गईं। जब बाकी सब सो गए।
सच कहूं तो मैं नहीं जानता।
मुझे किसी रिपोर्ट में यह नहीं मिला। और शायद मिलना भी नहीं चाहिए।
वह उसका अपना कमरा था। उसका अपना गम।
पर इतना जरूर जानता हूं कि दुख कहीं भागता नहीं।
आप उसे एक दिन के लिए टाल सकते हैं।
एक मैच के लिए। एक इम्तिहान के लिए। किसी की शादी के लिए।
पर वह इंतजार करता है।
दरवाजे के बाहर बैठा रहता है।
और मौका मिलते ही पूछता है, अब तो मेरे पास बैठोगे?
हमारे यहां मजबूती का मतलब ही उल्टा समझा जाता है।
हम उस बेटे की तारीफ करते हैं जो पिता की चिता के पास भी नहीं रोया।
हम उस मां को महान कहते हैं जो बेटे के जाने के अगले दिन रसोई में खड़ी थी।
और फिर बरसों बाद वही बेटा रात के तीन बजे छत पर अकेला बैठा मिलता है।
वही मां किसी पुरानी कमीज को देखकर घंटों चुप हो जाती है।
दुख को जगह न मिले, तो वह मन के किसी कोने में अपना घर बना लेता है।
सियामी की कहानी में मुझे सबसे खूबसूरत बात यही लगती है।
उन्होंने खेलना चुना, पर घर लौटना नहीं छोड़ा।
मैच के बाद वह घर गईं। मां के गले लगीं।
मां रोईं, और बेटी ने उन्हें जी भरकर रोने दिया।
यह भी मजबूती है।
और शायद असली मजबूती यही है।
उसी साल सियामी को अंतरराष्ट्रीय हॉकी महासंघ ने ‘राइजिंग स्टार ऑफ द ईयर’ चुना।
यह सम्मान पाने वाली वह पहली भारतीय बनीं।
फिर टोक्यो ओलंपिक में खेलकर वह मिजोरम की पहली महिला ओलंपियन भी बनीं।
वक्त चलता रहा।
हारें आईं। जीतें आईं।
सात साल गुजर गए।
और अब वह हिस्सा, जिसके लिए मैंने यह कहानी लिखी।
2 अक्टूबर 2026, शुक्रवार।
फिर जापान।
गिफु का मैदान। एशियाई खेलों का फाइनल।
सामने चीन, जो पिछली बार की चैंपियन थी।
और भारत की बेंच पर कौन बैठा था?
वही डच कोच। शोर्ड मारिन।
वही आदमी, जिससे सात साल पहले एक बच्ची ने कहा था कि पापा को गर्व महसूस कराना है।
भारत की महिला हॉकी टीम ने एशियाड का सोना आखिरी बार 1982 में जीता था। दिल्ली में।
चवालीस साल हो गए थे।
इस टीम की ज्यादातर खिलाड़ी तब पैदा भी नहीं हुई थीं।
मैच का दसवां मिनट।
गेंद दौड़ती हुई सियामी के पास आई।
और उन्होंने दौड़ते-दौड़ते उल्टी स्टिक से ऐसा जोरदार शॉट मारा कि गेंद सीधे जाल के ऊपरी हिस्से में जा धंसी।
चीन की गोलकीपर अपनी जगह खड़ी रह गई।
एक-शून्य।
उस दिन सियामी अपना दो सौवां अंतरराष्ट्रीय मैच खेल रही थीं।
उसके बाद चीन ने पूरी ताकत झोंक दी।
हमले पर हमला।
चीन को एक पेनल्टी स्ट्रोक भी मिला।
पर सविता ने छलांग लगाकर उसे रोक दिया।
सीटी बजी।
चवालीस साल का इंतजार खत्म।
और साथ में 2028 के लॉस एंजिलिस ओलंपिक का सीधा टिकट।
मीडिया की उसी रिपोर्ट में रानी रामपाल की बात भी है।
उनका कहना था कि सियामी ने उस दिन जो त्याग किया था, आज जाकर उसका सच्चा इनाम मिला है।
अब जरा यह तस्वीर अपनी आंखों के सामने रखिए।
2019। जापान की जमीन।
एक लड़की ने पिता को खोया, और उसी जमीन पर देश की ओलंपिक की उम्मीद बचाई।
2026। फिर जापान की जमीन।
वही लड़की। अब छब्बीस साल की।
बेंच पर वही कोच।
और उसकी स्टिक से वह गोल निकला, जिसका इंतजार पूरा देश चार दशक से कर रहा था।
मैं यह नहीं कहूंगा कि यह गोल उन्होंने पापा के लिए मारा।
पर मनोविज्ञान की एक बात आपसे जरूर कहना चाहता हूं।
बहुत साल तक माना जाता था कि दुख से उबरने का मतलब है, जाने वाले को भूल जाना। उससे रिश्ता तोड़ लेना।
फिर 1996 में तीन मनोवैज्ञानिकों, डेनिस क्लास, फिलिस सिल्वरमैन और स्टीवन निकमैन ने एक अलग बात कही।
उन्होंने इसे नाम दिया ‘कंटिन्यूइंग बॉन्ड्स’, यानी कभी न टूटने वाले रिश्ते।
उनका कहना था कि जो चला जाता है, उससे रिश्ता खत्म नहीं होता। बस उसका रूप बदल जाता है।
हम उसे अपने भीतर लेकर चलते हैं।
उसकी बातों में। उसकी सीख में। उसकी उम्मीदों में।
और ऐसा करना कोई बीमारी नहीं। यह इंसान के संभलने का एक स्वाभाविक रास्ता है।
जो पिता चले गए, उनकी तस्वीर आज भी पूजा वाली अलमारी में रहती है।
घर में कोई बड़ा फैसला हो, तो कोई न कोई कह ही देता है, बाबूजी होते तो यही कहते।
यही तो है वह रिश्ता, जो टूटता नहीं।
इसलिए अगर आपने किसी को खोया है,
और लोग कहते हैं कि अब भूल जाओ, आगे बढ़ो, तो उनकी बात आधी ही सही है।
आगे बढ़ना जरूरी है।
भूलना जरूरी नहीं।
और एक बात, जो मैं इस सीरीज की हर कहानी में कहता रहूंगा।
अगर किसी अपने को खोए महीनों हो गए हैं,
और नींद नहीं आती, भूख नहीं लगती, किसी काम में मन नहीं लगता,
हर सुबह उठना पहाड़ चढ़ने जैसा लगता है,
तो यह कमजोरी नहीं है।
इसका मतलब है कि अब दुख को किसी के सहारे की जरूरत है।
किसी अपने से बात कर लेना इलाज की पहली सीढ़ी है।
और डॉक्टर या काउंसलर से मिलना उतना ही आम है, जितना बुखार में दवा लेना।
कल, पांच अक्टूबर को, सियामी अपनी साथी खिलाड़ी लालथानतलुआंगी के साथ मिजोरम लौट रही हैं।
लेंगपुई हवाई अड्डे पर स्वागत होगा।
आइजोल में मुख्यमंत्री लालदुहोमा दोनों को सम्मानित करेंगे।
राज्य सरकार दोनों को 25-25 लाख रुपये देगी।
सात साल पहले भी वह जापान से घर लौटी थीं।
तब मां रोई थीं, और बेटी ने उन्हें थामा था।
कल वह फिर घर लौटेंगी।
भीड़ होगी। फूल होंगे। ढोल होंगे।
बस उस भीड़ में एक चेहरा नहीं होगा।
सात साल पहले उनके पास कहने को सिर्फ तीन शब्द थे।
सात साल बाद उन्होंने कुछ नहीं कहा।
बस एक गोल किया।
दसवें मिनट में।
गिफु के मैदान पर।
शायद वही उनका जवाब था।
इस कहानी से मैंने तीन बातें सीखीं।
पहली, दुख को टाला जा सकता है, मिटाया नहीं जा सकता। जो उसे बाद में जगह दे देता है, वही सच में संभलता है।
दूसरी, मजबूत होने का मतलब न रोना नहीं है। कभी-कभी मजबूती का मतलब है किसी और को रोने देना, और उसे थामे रहना।
तीसरी, जाने वाले चले जाते हैं, रिश्ते नहीं जाते। वे हमारी आदतों में, हमारे फैसलों में, और कभी-कभी किसी दसवें मिनट में लौट आते हैं।
किसी अपने के जाने के बाद जो दिन सबसे भारी लगें, उन दिनों के लिए यह कहानी सहेजकर रखने लायक है।
शायद आपके आसपास भी कोई है, जिसने हाल में किसी को खोया है और सबसे कहता फिर रहा है कि मैं ठीक हूं। यह कहानी उस तक पहुंच जाए, तो उसे इतना तो लगेगा कि वह अकेला नहीं है।
स्कोरबोर्ड पर जो दिखता है, वह खबर बनती है, और उसके पीछे जो छूट जाता है, वह यहां कहानी बनता है।
(राहुल मिश्रा)