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Thursday, May 21, 2026

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Justice to Twisha: देखिये धूर्त देहभाषा गिरिबाला की

Justice to Twisha: गिरिबाला सिंह की देहभाषा देखी आपने? कैसी धूर्त महिला है! अपनी और अपने बेटे के बचाव में कोई भी तर्क जड़े जा रही है..

बेटा खाली पाँव हॉस्पिटल में दौड़ रहा था, मेरे गमले सूख रहे थे, आदि आदि। इस पूरी बातचीत में इस महिला ने अपनी मृत बहू से कोई सहानुभूति नहीं दिखाई। उल्टा उसके चरित्र पर लांछन लगाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी इसने।

ऐसे ऐसे जघन्य आरोप कि ड्रग्स लेती थी, बदचलन थी वगैरह वगैरह। सच में? और इसने आपको पांच महीने में इतना सता दिया कि आपको उसकी हत्या करनी पड़ी। सोचिए, जो स्त्री एक मृतका को भी नहीं छोड़ रही, उसने जीते जी उस लड़की का क्या हाल किया होगा?

इतिहास गवाह है कि कानून के रखवालों ने ही कानून का सबसे ज्यादा बेड़ा गर्क किया है। यह गिरिबाला भी रिटायर्ड जज है, रसूखदार है। कानून की सभी धाराएँ रट रखी हैं, जाहिर है बच जाएगी। बेटे को पहले ही गायब कर रखा है।

पुलिस वाले भी घटना को आत्महत्या साबित करने की जल्दी में हैं। आप सोचिए कि यह लड़की एक पढ़ी – लिखी, आत्मनिर्भर और लोकप्रिय लड़की थी तो यह मामला प्रकाश में आया है वरना ऐसे कितने ही मामले गुपचुप तरीके से टेबल के नीचे से ही रफा-दफा कर दिए जाते हैं।

अब कृपा करके यह न कहें कि हमारे यहाँ ऐसा नहीं होता। मैं स्वयं एक ऐसी महिला को जानती हूँ जिसने अपनी दो बहुओं की हत्या की है और जेल में मामूली सी सजा काटने के बाद शान से जी रही है।

समाज की कंडीशनिंग देखिए कि ऐसे अधिकतर मामलों में महिलाएँ दोषी होती हैं। ये वही महिलाएँ हैं जो 50 की उम्र के बेटे की बेबी सिटिंग कर रही होती हैं और फिर उसे न्यायोचित भी ठहराती हैं। शायद यही कारण है कि विवाह संस्था की नींव चरमराने लगी है, आखिर क्यों न चरमराए, यह टिकी हुई भी तो महिलाओं की पीठ पर है।

विडंबना देखिए एकाध नीले ड्रम जैसे केसेज पर हाय-तौबा मचाने वाले लोगों के मुँह में ट्विशा और दीपिका जैसी घटनाओं पर दही जम जाता है।

थोड़े दिनों की बात है, फिर कोई नई घटना घटेगी और ट्विशा के केस को लोग भूल जाएंगे।अपराध आधारित वेब सीरीज आदि तो वैसे ही अपराधों के सामान्यीकरण में लगे हैं।

यह ऐसे नकारात्मक कार्यक्रमों का ही प्रभाव है कि अब हमें कोई भी घटना चौंकाती नहीं। लेकिन इस पूरे प्रकरण में ट्विशा के माता-पिता भी कोई कम दोषी नहीं। जब बेटी बार – बार बता रही है कि वह सुरक्षित नहीं महसूस कर रही, तो उन्हें तभी बच्ची को घर नहीं ले आना चाहिए था? अब कितना भी रो – कलप लें, बेटी तो जा चुकी।

आखिर समय रहते लोग क्यों नहीं समझते? ऐसी और कितनी फूल सी बच्चियाँ इस सड़ी – गली सामाजिक व्यवस्था की भेंट चढ़ेंगी? इस लड़की की बड़ी – बड़ी आँखें आपके हृदय में भी शूल सी नहीं चुभ रहीं?

(अर्चना आनंद भारती)

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