Soma Sharma Writes: यादें जिन्दा रखती हैं जिनमें एक खुशी भी होती है साथ होने की और एक उम्मीद भी फिर से मिलने की..
एक शहर जो मेरे अंदर बसा है…
बहुत याद करती हूं तुझे, कलकत्ता !!
वहां चुनावी बयार चल रही है। सत्ता पर काबिज होने का रणभेरी बज चुका है। दस्ते अपने अपने ठिकानों में सक्रिय हो चुके हैं। चाय के अड्डों से लेकर लोकल ट्रेनों में बस एक ही गान सुनाई से रहा है। जोड़ा फूल वर्सेज कमल फूल….
मैं बाबूघाट पर खड़ी हूं और अस्त होते सूर्य को अपने नैनों में कैद कर लेना चाहती हूं। सामने बहती हुगली नदी और उसपर शान से खड़ा हावड़ा ब्रिज ( रवींद्र सेतु) । ऐसा नजारा..किसी चित्रकार के जीवंत कैनवास जैसा है।
अभी जेटी पर स्टीमर आया नहीं है। यहीं खड़े रहकर स्टीमर का इंतज़ार करते करते हावड़ा ब्रिज से बातें करती रहूंगी। यह पुल सिर्फ दो शहरों को नहीं, मेरे अतीत और वर्तमान को भी जोड़ता है।
जेटी पर बैठकर स्टीमर का इंतज़ार… और उस इंतज़ार में ठहरा हुआ समय। अब लौटना है जयपुर…पर सच यह है कि मेरे कदम ही लौटते हैं, रूह का एक हिस्सा हर बार यहीं छूट जाता है।
हावड़ा स्टेशन से ट्रेन पकड़नी है, पर कोई जल्दी नहीं मुझे, थोड़ा वक्त और बिता लेना चाहती हूं। वैसे यह शहर दिल में बसा रहता है, हर सांस में।।
इस शहर की बात ही कुछ और है। दिल में कब्ज़ा कर लेता है। यकीन न हो, तो मशहूर शायर मिर्ज़ा ग़ालिब के शेर को सुन लीजिए ..
“कलकत्ते का जो ज़िक्र किया तू ने हमनशीं,
इक तीर मेरे सीने में मारा कि हाए हाए।”
कलकत्ता…
तुझे देखा नहीं, सिर्फ जिया जा सकता है।
(सोमा शर्मा सोमाद्रि)



