Medha Jha Writes: संतुलन सहज प्राकृतिक न्याय है जीवन के लिये..इसमें असंतुलन जीवन के साथ इतना अन्याय कर सकता है कि जीवन का अस्तित्व भी संकट में आ सकता है..
गणपति पूजा खूब धूमधाम से मनाया हमने। सात दिन तक गणपति की पूजा अर्चना की और रोज शाम में प्रेम से आरती में शामिल हुई। आरती गाते समय एक वाक्य आते ही चुप्पी छा जाती रही हर दिन मन और हृदय में – बांझण को पुत्र दे…। ये अकेले बाँझण क्यों है? साथ वाले के लिए क्यों आशीर्वाद नहीं मांगा जा रहा या सृष्टि को चलाने का ठेका सिर्फ स्त्रियों के हिस्से है? और जिसके हिस्से यह जिम्मेदारी है, मजे की बात है वह बेचारी अपने जैसा मांगने की हिम्मत भी नहीं कर पा रही प्यारे गणपति से।
पुत्रवती भव।’, -सुनते ही लगता है यह कोई आशीर्वाद नहीं, ईश्वर की सत्ता में सीधा आक्षेप हो, सृष्टि के संतुलन को असंतुलित करने के लिए अनजाने में की गई आकांक्षा हो।
इतना सहज रहा है यह आशीर्वाद देना कि लोग भूल जाते हैं कि अगर सच में सौ प्रतिशत दम्पत्ति पुत्री रत्न से वंचित हो जायें तो सृष्टि में हाहाकार मच जाएगा या फिर सृष्टि मानव ( मानवी भी) विहीन हो जाएगी।
इस आशीर्वाद ने एक जघन्य हत्या के लिए समाज को प्रेरित किया है और बिना किसी कसूर, लोग कितने मादा भ्रूण की हत्या करते चलें गए हैं या कर रहे हैं दबे छिपे। आश्चर्यजनक है कि सभ्रांत और विकसित दिखने वाले वर्ग में ये हत्या की संख्या ज्यादा है। हत्या , हत्या है और एक अजन्मे की हत्या करना किसी पाप से ज्यादा घृणित है।
इस जघन्य हत्या में नितांत धार्मिक , नौ दिनों का नवरात्रि मना कर धूम धाम से कन्या पूजन करती बहुत सी कूपमंडूक औरतें भी शामिल हैं। फिर आप गंगा यमुना गोदावरी में कितना भी डुबकी लगाएं, धुल नहीं सकेगा आपका पाप। सीखना हो तो जानवरों से सीखिए। वो लिंग भेद नहीं करते।
अगर आप सही परवरिश देंगे तो चाहे पुत्र हो या पुत्री – आपका ध्यान रखेंगे ही। बहुत अधिक प्राकृतिक असंतुलन हो चुका। देना ही हो आशीर्वाद, तो संतान होने का दीजिए या फिर मेरे जैसी स्त्रियों को पुत्रीवती होने का दीजिए, क्योंकि सालों साल सिर्फ पुत्र होने का आशीर्वाद देकर वैसे ही गलत कर चुके आप। तभी ये सृष्टि, त्योहार, रस रंग जीवन के बच पाएंगे। संसार के लिए दोनों आवश्यक हैं, संतुलन रहेगा तो सृष्टि रहेगी।
(मेधा झा)




