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Sunday, June 14, 2026

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Story: फांसी की रानी (Part-1)

Story: “फांसी देनी होगी।”, साहब ने कहा..वृद्ध ने नहीं में सिर हिलाया -“नहीं साहब। बहुत मौतें देख लीं। अब हाथ काँपते हैं।”..”देश का मामला है।” – “देश का होगा… मगर अब मैं नहीं करूँगा।”..पढ़िये आगे इस कहानी में..

 

असम की सबसे सुरक्षित मानी जाने वाली जेल उस सुबह असामान्य रूप से शांत थी।

जेल की ऊँची दीवारों के भीतर बंद था भारत का सबसे खतरनाक सीरियल किलर – रघुवीर बोरठाकुर।

उस पर चौदह लोगों की हत्या का आरोप सिद्ध हो चुका था। सुप्रीम कोर्ट तक उसकी फांसी की सजा बरकरार रह चुकी थी। अब सिर्फ तारीख का इंतजार था।

फांसी में दो महीने बाकी थे।

लेकिन तभी एक ऐसी समस्या सामने आई जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी।

जेल अधीक्षक ने असम के डीजीपी को फोन किया।

“सर… एक बड़ी दिक्कत हो गई है।”

“क्या हुआ?”

“जो जल्लाद फांसी देने वाला था, वह गंभीर रूप से बीमार पड़ गया है। डॉक्टरों ने साफ कह दिया है कि वह काम नहीं कर पाएगा।”

डीजीपी कुछ क्षण चुप रहे।

“कोई दूसरा?”

“एक मिला था सर… मगर उसने यह काम सालों पहले छोड़ दिया। अब वह चाय और बिस्कुट की छोटी सी दुकान चलाता है।”

अगले ही दिन अधिकारियों की एक टीम उससे मिलने पहुँची।

सफेद दाढ़ी वाला बूढ़ा आदमी दुकान के बाहर बैठा ग्राहकों को चाय दे रहा था।

“फांसी देनी होगी।”

वृद्ध ने सिर हिलाया।

“नहीं साहब। बहुत मौतें देख लीं। अब हाथ काँपते हैं।”

“देश का मामला है।”

“देश का होगा… मगर अब मैं नहीं करूँगा।”

और बात वहीं खत्म हो गई।

अब असम सरकार के सामने संकट खड़ा था।

इतना बड़ा मामला…

इतना चर्चित अपराधी…

और फांसी देने वाला कोई नहीं।

आखिरकार असम पुलिस ने पड़ोसी राज्यों से संपर्क करना शुरू किया।

सबसे उम्मीद भरी बातचीत हुई पश्चिम बंगाल से।

कोलकाता में बैठे डीजीपी ने पूरी बात सुनी।

फिर बोले,

“एक व्यक्ति तो मिला है…”

असम के अधिकारी खुश हो गए।

“बहुत बढ़िया!”

“लेकिन एक समस्या है।”

“क्या?”

“वह जल्लाद एक महिला है।”

फोन के दूसरी तरफ कुछ सेकंड तक सन्नाटा छा गया।

“महिला?”

“हाँ।”

“क्या पहले कभी फांसी दी है उसने?”

“नहीं।”

“फिर?”

कोलकाता के डीजीपी ने गहरी साँस ली।

“उसका नाम है – शूरा चौधरी।”

“और?”

“वह पहले जेल में रह चुकी है।”

अब सन्नाटा और गहरा हो गया।

“मतलब अपराधी?”

“दस साल की सजा काट चुकी है। डकैती के एक मामले में।”

असम पुलिस के अधिकारियों ने एक-दूसरे की तरफ देखा।

बात अजीब होती जा रही थी।

“फिर उसे जल्लाद क्यों माना जाए?”

डीजीपी ने जवाब दिया,

“क्योंकि उसका परिवार पीढ़ियों से यही काम करता आया है।”

“क्या उसे प्रक्रिया पता है?”

“आप खुद पूछ लीजिए।”

अगले दिन वीडियो कॉन्फ्रेंस हुई।

स्क्रीन पर पहली बार शूरा चौधरी दिखाई दी।

कमरे में बैठे अधिकारी कुछ क्षण उसे देखते रह गए।

छह फुट लंबा कद।

मजबूत कंधे।

सांवला चेहरा।

घनी काली आँखें।

और सबसे अलग…

उसके बाल।

पाँच छोटी-छोटी चोटियाँ।

जो सिर के पीछे एक साथ बाँधी गई थीं।

उसने साधारण नीली शर्ट पहन रखी थी।

काली पैंट।

और पैरों में राजस्थान के चमड़े वाले नुकीले जूते।

वह किसी बेरोजगार महिला जैसी नहीं लग रही थी।

उसे देखकर ऐसा लगता था जैसे वह या तो किसी पुलिस कमांडो यूनिट में हो…

या फिर किसी गैंग की सरगना।

डीजीपी ने पूछा,

“तुम्हें सचमुच पता है कि फांसी कैसे दी जाती है?”

शूरा मुस्कुराई।

“थोड़ा बहुत।”

“थोड़ा बहुत?”

“बचपन में दादाजी के साथ जेल गई थी।”

“क्यों?”

“उन्होंने एक कैदी को फांसी दी थी।”

कमरे में बैठे कई अधिकारी चौंक गए।

“तुमने देखा था?”

“सब कुछ।”

“पूरा?”

“हाँ।”

उसकी आवाज में कोई हिचक नहीं थी।

“दादाजी ने मुझे रस्सी दिखायी थी। फंदा बनाना सिखाया था। यह भी बताया था कि गर्दन की कौन सी हड्डी टूटनी चाहिए।”

अब कमरे में मौजूद सभी अधिकारी गंभीर हो गए।

वह मजाक नहीं कर रही थी।

उसे सचमुच जानकारी थी।

करीब दो घंटे तक उससे सवाल पूछे गए।

हर सवाल का जवाब उसने बिना रुके दिया।

अंततः असम पुलिस ने फैसला कर लिया।

शूरा चौधरी को नियुक्त किया जाएगा।

दो सप्ताह बाद।

गुवाहाटी।

सेंट्रल जेल।

सुबह आठ बजे।

एक जीप जेल परिसर में दाखिल हुई।

उसमें से उतरी शूरा चौधरी।

गार्ड उसे देखते ही रह गए।

वह किसी फिल्मी किरदार जैसी लग रही थी।

आत्मविश्वास से भरी।

सख्त।

बिना किसी डर के।

जेल अधीक्षक उसे सीधे फांसीघर ले गया।

लोहे का भारी दरवाजा खुला।

अंदर मौत का मंच खड़ा था।

शूरा ने चारों तरफ नजर दौड़ाई।

फिर बोली,

“रघुवीर बोरठाकुर को यहीं लटकाया जाएगा?”

“हाँ।”

वह धीरे-धीरे चबूतरे पर चढ़ गई।

उसने ऊपर लटकते फंदे को देखा।

फिर नीचे झुककर ट्रैपडोर का निरीक्षण किया।

लोहे का हैंड-गियर।

स्प्रिंग।

लॉकिंग सिस्टम।

सब कुछ।

उसने खुद हैंडल पकड़कर खींचा।

धड़ाम!

नीचे की लकड़ी की पट्टियाँ खुल गईं।

“ठीक काम कर रहा है।”

अधिकारियों ने राहत की साँस ली।

अगले कई दिनों तक तैयारी चलती रही।

नई रस्सी मंगाई गई।

उसे खास तरीके से तैयार किया गया।

पुराने नियमों के अनुसार रस्सी को घी पिलाया गया ताकि उसमें पर्याप्त चिकनाहट बनी रहे।

फिर उसे खींच-खींचकर मजबूत बनाया गया।

वजन बाँधकर कई बार परीक्षण हुआ।

हर परीक्षण के समय शूरा मौजूद रहती।

कभी कुछ नापती।

कभी कुछ लिखती।

कभी सिर्फ खड़ी होकर देखती रहती।

धीरे-धीरे जेल कर्मचारी उसे सम्मान से देखने लगे।

उसके काम में एक अजीब तरह की गंभीरता थी।

मानो वह किसी मौत की नहीं…

एक जिम्मेदारी की तैयारी कर रही हो।

पूरा एक सप्ताह बीत गया।

सभी व्यवस्थाएँ संतोषजनक पाई गईं।

अब शूरा वापस कोलकाता लौटने वाली थी।

जेल के मुख्य द्वार तक उसे छोड़ने आए अधीक्षक ने पूछा,

“डर नहीं लगता?”

शूरा ने हल्की मुस्कान दी।

“किससे?”

“मौत से।”

वह कुछ क्षण चुप रही।

फिर बोली,

“मौत से नहीं साहब…”

“फिर?”

“गलत आदमी को मौत देने से।”

इतना कहकर वह जीप में बैठ गई।

गाड़ी धीरे-धीरे दूर निकल गई।

लेकिन किसी को नहीं पता था…

कि असली कहानी अब शुरू होने वाली थी।

क्योंकि फांसी की तारीख जितनी करीब आ रही थी…

उतनी ही तेजी से एक ऐसा रहस्य सामने आ रहा था जो पूरे भारत को हिला देने वाला था। (क्रमशः)

(सुमन पारिजात)

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