माँ, तुम मेरी रग-रग में बसी हो !
सवेरे के सारे काम निपटाकर
आज बैठी थी कुछ कच बनाने…
सुई हाथ में थी, धागा उँगलियों में,
और अचानक—
सुई की नोक उँगली में चुभ गई.
मुँह से अनायास निकला..
“माँ…”
और तुम फिर याद आ गईं माँ…
वैसे तुम्हें याद करने के लिए
किसी बहाने की ज़रूरत ही कहाँ है?
तुम्हें तो मैं कभी भूलती ही नहीं,
क्योंकि तुम मेरी यादों में नहीं,
मेरे रग-रग में बसी हो माँ.
इस हाड़-मांस के शरीर में
बहते रक्त की एक-एक बूँद
तुम्हारी ऋणी है.
जन्म तुमने दिया,
गोद में खिलाया,
पाला-पोसा,
चलना सिखाया,
बोलना सिखाया,
और फिर जीवन को
सलीके से जीना भी सिखाया.
तुमने हमें केवल पढ़ाया नहीं,
जीवन पढ़ना सिखाया.
खाना बनाना सिखाया,
सिलाई, कढ़ाई, बुनाई सिखाई,
संगीत और नृत्य से जोड़ा,
और मेरी कविता की उड़ान को
हर बार प्रोत्साहन के पंख दिए.
याद है माँ,
जब बचपन में तुम्हारे पास बैठकर
कच बनाया करती थी?
सुई कभी इधर चली जाती,
कभी उधर…
तब तुम बड़े प्यार से कहतीं….
“देखो बेटा,
एक गलत सिलाई
पूरे कच को बिगाड़ सकती है.”
तब कहाँ समझती थी
उस छोटी-सी बात में छिपा
जीवन का इतना बड़ा दर्शन!
आज समझती हूँ माँ…
तुम मुझे केवल सिलाई नहीं सिखा रही थीं,
तुम मुझे रिश्ते सीना सिखा रही थीं.
तुम्हीं ने तो समझाया था—
एक गलत शब्द,
एक गलत व्यवहार,
एक गलत कदम
कभी-कभी वर्षों से बने रिश्ते को
उधेड़ सकता है.
तुमने सिखाया
कि रिश्ते भी कच की तरह होते हैं माँ—
बड़े धैर्य से,
एक-एक टाँके से,
प्रेम और समझदारी से
सींचने पड़ते हैं.
तुमने हमें सिखाया
कैसे उठना है,
कैसे बैठना है,
कैसे बोलना है,
किसी के घर जाकर
कैसे व्यवहार करना है.
हाँ माँ,
आज का समय बहुत बदल गया है.
दुनिया आधुनिक हो गई है,
सोच बदल गई है,
तकनीक ने जीवन को
कितना आगे पहुँचा दिया है.
लेकिन तुम्हारी सीख
आज भी उतनी ही सच्ची लगती है.
तुमने कभी हमें
लड़का और लड़की होने के आधार पर
अलग नहीं किया.
हम तीन बहनें और दो भाई—
तुमने सबको
एक ही प्यार दिया,
एक ही अनुशासन दिया,
एक ही शिक्षा दी.
तुम्हारे समय में भी
तुमने हमें आधुनिक होने से
कभी नहीं रोका.
मिनी स्कर्ट, मिडी, फ्रॉक,
स्कर्ट के साथ सस्पेंडर,
बैलून स्कर्ट, जींस…
जो समय में आया,
तुमने हमें पहनाया.
हमारे बाल भी
कभी बॉब कट रहे,
कभी छोटे स्टेप कट…
तुमने हमें
समय के साथ चलना सिखाया.
फिर भी बेटियों को
कुछ अतिरिक्त संस्कार दिए.
क्योंकि तुम जानती थीं….
हमारी बेटियाँ एक दिन
अपना घर छोड़कर
किसी दूसरे घर की
बहू बनकर जाएँगी.
इसलिए तुमने हमें
बाँधना नहीं,
ढलना सिखाया.
सहन करना नहीं,
समझना सिखाया.
अपने अस्तित्व को मिटाना नहीं,
बल्कि अपने व्यवहार से
नए घर में अपना स्थान बनाना सिखाया.
और माँ…
तुम्हारी वह सीख
हमारे जीवन में सच भी हुई.
तुम अक्सर कहती थीं…
“सुबह थोड़ा जल्दी उठा करो,
तुम्हारे लिए ही अच्छा होगा.”
तब लगता था,
माँ भी न…
हर बात में समझाती रहती हैं!
आज लगता है—
तुम्हारी हर बात के पीछे
जीवन का अनुभव खड़ा था.
तुम्हारी सीख
तब अनुशासन लगती थी,
आज वही
हमारी ताकत लगती है.
दुनिया चाहे
कितनी भी आधुनिक हो जाए,
संसार चाहे
कितना भी आगे बढ़ जाए,
तकनीक चाहे
हमारे जीवन को
कितना भी बदल दे…
कुछ चीज़ें ऐसी होती हैं
जो अपनी मर्यादा में ही
सुंदर लगती हैं.
संस्कार उनमें से एक हैं माँ.
और ये संस्कार
मुझे तुमसे विरासत में मिले हैं.
आज जब कोई
हमारी आदतों की प्रशंसा करता है,
हमारे व्यवहार को सराहता है,
तो मन भीतर से कह उठता है….
“हाँ…
ये मेरी माँ की दी हुई सीख है.”
और माँ,
तुम्हारी एक और बात
आज मुझे बहुत सुंदर लगती है.
जिस समय
अधिकतर घरों में
लड़कों से रसोई की उम्मीद नहीं की जाती थी,
तुमने अपने बेटों को भी
अपने हाथ से खाना बनाना सिखाया.
शायद तब मुझे
इसमें तुम्हारी दूरदर्शिता समझ नहीं आई थी.
लेकिन आज समझती हूँ—
तुम केवल बेटियों को
भविष्य के घर के लिए तैयार नहीं कर रही थीं,
तुम बेटों को भी
जीवन के लिए तैयार कर रही थीं.
और शायद इसी वजह से
जब मैं विदा हुई,
तुमने मुझे यह भी सिखाया—
“समय के साथ बदलना,
लेकिन अपने संस्कार मत बदलना.”
माँ,
आज मैं भले ही
एक बेटी की माँ नहीं हूँ,
लेकिन एक बेटे की माँ हूँ.
और अपने बेटे को
हर स्त्री का सम्मान करना,
हर लड़की से
सम्मानपूर्वक बात करना,
उसकी गरिमा को समझना..
ये सब सिखाते हुए
मुझे बार-बार तुम्हारी याद आती है.
क्योंकि मेरे बेटे के संस्कारों की
जो पहली नींव है,
वह वास्तव में
तुम्हारे ही हाथों रखी गई थी.
तुमने मुझे जो दिया,
मैं वही आगे बाँट रही हूँ.
तुमने मुझे
जीवन दिया,
संस्कार दिए,
सलीका दिया,
सम्मान देना सिखाया,
और सबसे बढ़कर..
एक अच्छा इंसान बनना सिखाया.
आज पीछे मुड़कर देखती हूँ तो लगता है,
माँ, तुमने हमें
केवल बड़ा नहीं किया…
तुमने हमें गढ़ा है.
सुई की उस छोटी-सी चुभन ने आज
बचपन की कितनी बड़ी दुनिया
मेरे सामने खोल दी.
एक सुई,
एक धागा,
एक कच…
और उनमें छिपी
तुम्हारी पूरी जिंदगी की सीख.
माँ,
तुम्हारे जैसा मेरे लिए
न कोई था,
न है,
और न कभी हो सकता है.
क्योंकि—
माँ तो माँ होती है.
और मेरी माँ…
मेरी माँ तो
मेरी साँसों में,
मेरी आदतों में,
मेरी भाषा में,
मेरे व्यवहार में,
मेरे संस्कारों में…
आज भी मेरे रग-रग में बसी है.
(अंजू डोकानिया)