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Tuesday, June 23, 2026

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Story: फांसी की रानी – Chapter 2

Story:रघुवीर शूरा को ढाल बनाकर खड़ा था।..उसकी आँखें खून पीने वाले भेड़िए जैसी लग रही थीं।..वह दहाड़ा।.. -“पीछे हट जाओ सारे!”..

मौत के मंच पर बगावत

ये तिथि थी 17 दिसंबर की।स्थान था गुवाहाटी सेंट्रल जेल का।

और समय था सुबह के साढ़े तीन बजे का।

बाहर घना कोहरा पसरा था।

तापमान दो डिग्री तक गिर चुका था। जेल की ऊँची दीवारों पर जमी नमी टॉर्च की रोशनी में चमक रही थी।

आज का दिन अलग था।

आज रघुवीर बोरठाकुर को फांसी दी जानी थी।

देश के सबसे खतरनाक सीरियल किलरों में गिने जाने वाले उस आदमी की आखिरी सुबह।

लेकिन हैरानी की बात यह थी कि मौत उससे कहीं ज्यादा परेशान लग रही थी…

जितना वह खुद।

शूरा चौधरी रात में ही जेल पहुँच गई थी।

ठीक तीन बजे।

वह हमेशा की तरह काली पैंट, धूसर शर्ट और अपने पुराने चमड़े के नुकीले जूते पहने हुए थी।

उसकी पाँचों चोटियाँ आज भी सिर के पीछे बंधी थीं।

वह सीधे फांसीघर पहुँची।

रस्सी जांची।

फंदा जांचा।

हैंड-गियर जांचा।

ट्रैपडोर जांचा।

लोहे की हर पिन और हर बोल्ट को अपने हाथों से परखा।

उसकी आँखों में वही एकाग्रता थी जो किसी सर्जन की ऑपरेशन थिएटर में होती है।

आज गलती की कोई गुंजाइश नहीं थी।

उधर जेल की कालकोठरी में रघुवीर सो रहा था।

ऐसे जैसे कोई किसान दिन भर खेत में काम करके लौटा हो।

साढ़े तीन बजे दरवाजा खुला।

“रघुवीर!”

एक सिपाही चिल्लाया।

वह धीरे-धीरे उठा।

अंगड़ाई ली।

फिर मुस्कुराया।

“आ गया समय?”

सिपाही ने कोई जवाब नहीं दिया।

उसे देखकर ऐसा बिल्कुल नहीं लग रहा था कि चार घंटे बाद नहीं…

सिर्फ एक घंटे बाद उसकी मौत होने वाली है।

नहाने का समय हुआ।

जेल नियमों के अनुसार गर्म पानी तैयार किया गया था।

बड़ी बाल्टी में।

भाप उठ रही थी।

लेकिन रघुवीर ने देखते ही सिर हिला दिया।

“इसे वापस ले जाओ।”

सिपाही चौंका।

“क्यों?”

“ठंडा पानी लाओ।”

“पागल हो क्या?”

“और सुनो…”

वह हँसा।

“एक नहीं। तीन बाल्टी।”

“तीन?”

“आज आखिरी दिन है मेरा। जी भरकर नहाऊँगा।”

सिपाही एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे।

बाहर दो डिग्री तापमान था।

लेकिन कुछ देर बाद सचमुच तीन बाल्टियाँ बर्फ जैसे ठंडे पानी की लाई गईं।

और सबकी आँखों के सामने रघुवीर ने आराम से पूरा स्नान किया।

न कोई कंपकंपी।

न कोई शिकायत।

न कोई डर।

स्नान के बाद उसने जेल द्वारा दिए गए सफेद कपड़े पहन लिए।

फिर चुपचाप बैठ गया।

घड़ी की सुइयाँ आगे बढ़ती रहीं।

सुबह 4:25।

फांसीघर।

सब तैयार था।

एसपी मुकुंद बरुआ।

डीएसपी।

चार सशस्त्र प्रहरी।

दो अधिकारी।

और उनके बीच खड़ी थी शूरा चौधरी।

आज उसकी आँखें पहले से भी ज्यादा ठंडी लग रही थीं।

रघुवीर को लाया गया।

हाथ पीछे बंधे हुए थे।

कदम धीमे थे।

लेकिन चेहरे पर वही मुस्कान।

मानो किसी शादी में आया हो।

एसपी मुकुंद आगे बढ़े।

“रघुवीर बोरठाकुर।”

“जी।”

“तुम्हारी कोई आखिरी इच्छा?”

यह सुनते ही वह जोर से हँस पड़ा।

इतना कि दो सिपाही घबरा गए।

“इच्छा मत पूछो साहब।”

“फिर भी बताओ।”

“पूरी नहीं कर पाओगे।”

“कोशिश करेंगे।”

कुछ सेकंड वह चुप रहा।

फिर बोला,

“मेरी पत्नी ने पिछले महीने मेरे लिए कपड़े भेजे थे।”

“हाँ?”

“मरने से पहले उन्हें पहनना चाहता हूँ।”

लॉकर से कपड़े मंगवाए गए।

कुर्ता।

पायजामा।

सादा लेकिन साफ-सुथरा।

उन्हें लाने में दस मिनट लग गए।

पहनने में और दस मिनट।

अब समय 4:45 हो चुका था।

फांसी की निर्धारित अवधि शुरू हो चुकी थी।

शूरा आगे बढ़ी।

उसने काला कपड़ा उठाया।

रघुवीर के सिर पर पहनाया।

फिर उसके बंधे हाथ जांचे।

गाँठें मजबूत थीं।

सब कुछ ठीक था।

उसने एसपी की तरफ देखा।

हल्का सा सिर हिलाया।

संकेत साफ था।

सब तैयार है।

एसपी मुकुंद ने अपनी जेब में हाथ डाला।

एक लाल रुमाल निकाला।

घड़ी देखी।

4 बजकर 50 मिनट।

बस कुछ सेकंड।

और सब खत्म।

शूरा ने फंदा उठाया।

रघुवीर की गर्दन में डाला।

फिर हैंड-गियर के पास खड़ी हो गई।

उसकी उंगलियाँ लीवर को छू रही थीं।

पूरा कमरा शांत था।

इतना शांत कि लोगों को अपनी साँसें सुनाई दे रही थीं।

एसपी ने हाथ उठाया।

लाल रुमाल हवा में लहराया।

एक…

दो…

तीन…

और फिर…

रुमाल नीचे गिर गया।

लेकिन उसी क्षण…

कुछ ऐसा हुआ जिसकी किसी ने कल्पना तक नहीं की थी।

काला कपड़ा अचानक उड़कर जमीन पर गिरा।

रघुवीर का सिर बाहर था।

उसकी आँखों में एक जंगली चमक थी।

और अगले ही पल…

उसके हाथ आजाद थे।

“क्या-!!”

एक सिपाही चीखा।

किसी को समझ ही नहीं आया कि हुआ क्या।

सिर्फ एक चमक दिखाई दी।

इस्पात की चमक।

रघुवीर के हाथ में एक लंबा, बेहद धारदार चाकू था।

शायद वही चाकू…

जो उसने अपनी आखिरी इच्छा में मंगवाए गए कुर्ते के भीतर छिपाकर रखा था।

सब कुछ एक सेकंड से भी कम समय में हुआ।

वह बिजली की तरह मुड़ा।

और पीछे खड़ी शूरा चौधरी को पकड़ लिया।

चाकू उसकी गर्दन पर था।

धार त्वचा से सटी हुई।

चारों राइफलें तुरंत उठ गईं।

पिस्तौलें बाहर आ गईं।

डीएसपी ने निशाना साध लिया।

लेकिन अब बहुत देर हो चुकी थी।

रघुवीर शूरा को ढाल बनाकर खड़ा था।

उसकी आँखें खून पीने वाले भेड़िए जैसी लग रही थीं।

वह दहाड़ा।

“पीछे हट जाओ सारे!”

किसी ने हिलने की हिम्मत नहीं की।

उसने चाकू और दबाया।

शूरा की गर्दन पर लाल रेखा उभर आई।

“एक कदम भी आगे बढ़े…”

वह पागलों की तरह चिल्लाया।

“…तो यहीं काट दूँगा इस बुलबुल की गर्दन!”

फांसीघर में मौत का कैदी अब शिकारी बन चुका था।

और जिसे उसे फांसी देनी थी…

वही महिला अब उसकी कैदी थी।

लेकिन किसी ने ध्यान नहीं दिया…

कि चाकू गर्दन पर होने के बावजूद…

शूरा चौधरी के चेहरे पर डर का नामोनिशान नहीं था।

बल्कि…

वह हल्का सा मुस्कुरा रही थी।

और वह मुस्कान देखकर…

एसपी मुकुंद बरुआ के चेहरे का रंग अचानक बदल गया।

क्योंकि उन्हें याद आया…

कोलकाता के डीजीपी ने एक बात बताई थी…

जो उन्होंने किसी और को नहीं बताई थी।

“शूरा चौधरी सिर्फ पूर्व अपराधी नहीं है… जेल में रहते हुए उसने लगातार छह बार राष्ट्रीय महिला कुश्ती चैंपियनशिप जीती थी।”

और अगले ही पल…

कुछ ऐसा होने वाला था…

जिसकी कल्पना रघुवीर ने सपने में भी नहीं की थी.. (क्रमशः)

(त्रिपाठी पारिजात)

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