कभी-कभी ज़िंदगी दो लोगों को ऐसे मिलाती है, जैसे किसी अनजानी किताब के दो पन्ने अचानक हवा के झोंके से एक-दूसरे से चिपक जाएँ।
परेश और रमणी की कहानी भी कुछ ऐसी ही थी।
न कोई वादा था।
न कोई दावा।
न कोई मंज़िल।
फिर भी दोनों एक-दूसरे की ओर ऐसे खिंचते चले जा रहे थे, जैसे दूर आसमान में दो सितारे किसी अदृश्य गुरुत्वाकर्षण से बंधे हों।
उस रात रमणी ने सिर्फ इतना लिखा था—
“वो भी बिना बात के खुश हैं हम भी।”
और उस एक वाक्य ने परेश के भीतर जैसे सैकड़ों दीप जला दिए थे।
उसने मुस्कुराकर जवाब दिया था—
“हम वैसे तो बिना बात के खुश हैं, पर देखें तो कमाल की बात पर खुश हैं।”
स्क्रीन के उस पार बैठी रमणी हल्के से मुस्कुराई थी।
उसे क्या पता था कि कोई इन्सान उसके एक शब्द पर इतना खुश हो सकता है।
दिन गुजरते गए।
संदेश बढ़ते गए।
और दोनों के बीच एक ऐसा रिश्ता जन्म लेने लगा जिसका कोई नाम नहीं था।
रमणी कभी उसे “बिल्लू” कहती।
वह उसे “पिंकी”।
और फिर घंटों दोनों इसी बात पर मुस्कुराते रहते।
एक रात परेश ने हिम्मत करके कहा—
“एक रिक्वेस्ट करूँ?”
“हाँ।”
“तुम मुझे आप मत कहा करो।”
रमणी कुछ देर चुप रही।
फिर बोली—
“कल से कोशिश करूँगी।”
उस रात परेश शायद सोया नहीं।
एक साधारण-सा शब्द उसके लिए किसी प्रेम-पत्र से कम नहीं था।
अगले दिन जब रमणी ने पहली बार लिखा—
“तुम”
तो परेश की खुशी का ठिकाना नहीं रहा।
उसे लगा जैसे किसी ने उसके दिल पर धीरे से अपना नाम लिख दिया हो।
उस रात दोनों बहुत देर तक जागते रहे।
उन्होंने मिलने की योजना बनाई।
बस पाँच मिनट के लिए।
सिर्फ पाँच मिनट।
कॉफी के दो कप।
एक गीत।
एक ग़ज़ल।
और एक मुस्कान।
लेकिन उन पाँच मिनटों के भीतर दोनों पूरी ज़िंदगी जी लेना चाहते थे।
परेश ने लिखा—
“हम उन पाँच मिनटों में सारी ज़िंदगी जी लेंगे।”
रमणी स्क्रीन को देखती रही।
उसके होंठों पर अनायास मुस्कान आ गई।
वह समझने लगी थी कि यह आदमी सामान्य नहीं है।
यह प्रेम को समय से नहीं, एहसासों से मापता है।
कभी-कभी दोनों मज़ाक में अगले जन्म की शादी की बातें करने लगते।
कभी जुपिटर पर जाने की।
कभी सपनों में मिलने की।
कभी ऐसी दुनिया की, जहाँ दूरी नाम की कोई चीज़ न हो।
और इन्हीं बातों के बीच अनजाने में कुछ और भी जन्म ले रहा था।
एक गहरी चाहत।
एक बेचैन प्रतीक्षा।
एक मीठी तड़प।
रात के सन्नाटों में परेश अक्सर उसकी तस्वीर को देखता रहता।
उसे लगता जैसे रमणी की मुस्कान स्क्रीन से निकलकर उसके कमरे में फैल गई हो।
उधर रमणी भी महसूस करने लगी थी कि ये इन्सान उसे बाकी लोगों की तरह नहीं देखता।
वह उसके चेहरे से ज्यादा उसकी खामोशियों को पढ़ता है।
उसकी बातों से ज्यादा उसकी चुप्पियों को सुनता है।
एक रात रमणी ने अचानक लिख दिया—
“तुम बहुत अकेले से दिखते हो मुझे।”
परेश देर तक स्क्रीन को देखता रह गया।
उसकी उंगलियाँ कीबोर्ड पर थीं, मगर शब्द कहीं खो गए थे।
क्योंकि पहली बार किसी ने उसकी हँसी के पीछे छुपे अकेलेपन को पहचान लिया था।
उसी रात उसने महसूस किया कि यह रिश्ता अब सिर्फ बातचीत नहीं रह गया है।
यह दो आत्माओं का मिलना बन चुका है।
रमणी कभी उससे कुछ नहीं माँगती थी।
न कोई वादा।
न कोई भविष्य।
न कोई अधिकार।
बस एक बात।
“तुम खुश रहो।”
और शायद यही बात परेश को सबसे ज्यादा छूती थी।
वह सोचता था—
दुनिया में कितने लोग होते हैं जो तुम्हारी खुशी को अपनी खुशी बना लें?
एक दिन रमणी ने लिखा—
“तुम अपने सपनों की ऊँचाइयों को छूना। जब पीछे मुड़कर देखोगे, तुम्हें मैं खड़ी मिलूँगी।”
परेश का दिल भर आया।
उसने जवाब दिया—
“पीछे नहीं। साथ में।”
काफी देर तक दोनों में से कोई कुछ नहीं लिख पाया।
कुछ रिश्तों में शब्द कम पड़ जाते हैं।
और भावनाएँ ज्यादा हो जाती हैं।
उस रात भी ऐसा ही हुआ।
दोनों स्क्रीन के सामने बैठे रहे।
मुस्कुराते रहे।
और महसूस करते रहे कि हजारों किलोमीटर दूर होने के बावजूद कोई उनके बहुत करीब बैठा है।
इतना करीब…
कि उसकी धड़कनें भी सुनाई दे रही हैं।
और शायद प्रेम की सबसे खूबसूरत गर्मी यही होती है—
जब कोई तुम्हें छुए बिना भी तुम्हारे भीतर उतर जाए।
(सुमन पारिजात)



