Ladies First: मर्दों को महत्वाकांक्षा की जरूरत क्यों नहीं पड़ती? – असली वजह जानकर चौंक जाओगे
आखिर क्यों लड़कियां पढ़ाई, करियर और जिंदगी में आगे निकल रही हैं और लड़के पीछे रह जाते हैं? क्या मर्दों को सच में महत्वाकांक्षा की जरूरत नहीं? पढ़िए यह जबरदस्त विश्लेषण जो आपकी सोच बदल देगा।
कॉलेज के दिनों की बात है। मेरे आसपास जितनी भी लड़कियां थीं — लगभग सबने विदेश में पढ़ाई की। एक सेमेस्टर नहीं, पूरा साल। फ्रांस, वियतनाम, श्रीलंका, न्यूजीलैंड — जहां भी मौका मिला, गईं। स्कॉलरशिप का पैसा भी मिलता था इसमें, तो खर्चा भी उतना नहीं था। सब कुछ अनुकूल था।
और लड़के?
उंगलियों पर गिन सकती थी। दो हाथ काफी थे।
कुछ ने कहा — मेरा विषय ऐसा नहीं है। पर वही विषय पढ़ने वाली लड़कियां गई थीं। कुछ ने कहा — प्लानिंग नहीं हो पाई। और बाकी? बाकी बस… नहीं गए। बिना किसी खास वजह के।
तो असल में क्या हो रहा है?
अर्थशास्त्री रिचर्ड रीव्स की किताब है — Of Boys and Men। उन्होंने जो डेटा दिया, वो हिलाने वाला है।
1972 में जब अमेरिका में टाइटल IX पास हुआ था – तब उच्च शिक्षा में पुरुषों और महिलाओं के बीच 13 प्रतिशत का अंतर था। पुरुष आगे थे। आज भी 15 प्रतिशत का अंतर है – पर अब महिलाएं आगे हैं।
हाई स्कूल में लड़कियों के ग्रेड लड़कों से बेहतर हैं। विदेश में पढ़ने जाने वाले छात्रों में दो-तिहाई लड़कियां हैं। अमेरी कोर औऱ पीस कोर में महिलाएं दोगुनी तादाद में हैं। मास्टर्स डिग्री लेने वालों में 63 फीसदी महिलाएं। घर खरीदने में अविवाहित महिलाएं पुरुषों से आगे।
और घर पर रहने में? वहां पुरुष आगे हैं।
रीव्स इसे एक बड़ी तस्वीर का हिस्सा मानते हैं। एक किस्म की सुस्ती। एक बहाव। जैसे कोई दिशा ही नहीं है। लड़के बस… चले जा रहे हैं – जहां हवा ले जाए।
पर यह “गिरावट” है या कुछ और?
यहीं से असली सवाल शुरू होता है।
क्या सच में लड़कों की महत्वाकांक्षा खत्म हो रही है? या फिर — यह पहले से ऐसा ही था, बस किसी ने नोटिस नहीं किया?
सोचो जरा। अगर समाज ने पहले से तय कर रखा हो कि तुम्हें सफल होना ही है — कि नौकरी मिलेगी, तरक्की होगी, सम्मान मिलेगा — तो फिर मेहनत करने की जरूरत ही क्या है? जब फल पके पकाए मिलते हों, तो कोई पेड़ क्यों लगाए?
एक पाठक ने बहुत सटीक बात कही थी – “मर्दों को महत्वाकांक्षा की जरूरत नहीं होती। उनके पास प्रिविलेज है। वो आगे बढ़ते रहते हैं – जब तक कि खुद बर्बाद न कर लें।” यही तो बात है।
लड़कियां इतनी मेहनत क्यों करती हैं?
क्योंकि उनके पास कोई चारा नहीं।
लड़कियों को बचपन से ही पता होता है कि जिंदगी उनके लिए उतनी आसान नहीं है। वो देखती हैं – मां को, बड़ी बहन को, पड़ोस की आंटी को। जो सपने थे, वो कहां गए? प्रेग्नेंसी आई, शादी हुई, घर संभाला – और सपने किसी कोने में दब गए।
तो वो लड़कियां जो पढ़ती हैं – वो सिर्फ पढ़ नहीं रहीं। वो एक ढांचा बना रही हैं। एक ऐसी नींव जो किसी भी झटके में न गिरे। जीपीए, ऑनर्स, डिग्री, क्रेडेन्शियल्स – ये सब उनके लिए सिर्फ कागज नहीं, बल्कि एक कवच है।
और यही प्लानिंग, यही ऑर्गैनाइजेशन – यह उन्हें कहां से सीखनी पड़ती है? हर जगह से।
एल वुड्स को देखो -लीगली ब्लॉन्ड में। हेरमिओन ग्रैन्गर को देखो। लेस्ली नोप, एमी सान्तिआगो, ओलीविया पोप – ये सब “” हैं। जिनके पास प्लान है, बैकअप प्लान है, और बैकअप का भी बैकअप है।
लड़कियां इन्हें देखकर बड़ी होती हैं। और समझती हैं — बिना प्लानिंग के आगे नहीं बढ़ेंगी।
और लड़के क्या सीखते हैं?
यही कि – सब ठीक हो जाएगा।
कि चीजें अपने आप काम करती हैं। कि डिग्री मिलेगी, नौकरी मिलेगी, सब सेट हो जाएगा। किसी ने यह सीधे नहीं बताया – पर समाज यही मेसेज देता है। हर तरफ से।
और जब यह संदेश बचपन से मिल रहा हो – तो विदेश पढ़ने जाने की प्लानिंग सोफोमोर इयर से क्यों करें? घर क्यों खरीदें? पीस कोर में क्यों जाएं?
रीव्स कहते हैं कि लड़के पर्यावरण के प्रति ज्यादा संवेदनशील होते हैं। मतलब – गरीबी, घर में अस्थिरता, मोहल्ले का माहौल – इनका असर लड़कों पर लड़कियों से ज्यादा पड़ता है। वो इसे ऑर्चिड और डैन्डेलियन के मेटाफर से समझाते हैं। ऑर्चिड नाजुक होता है – ठीक माहौल चाहिए। डैन्डेलियन कहीं भी उग जाता है।
तो गलती किसकी है?
यह सवाल ही गलत है
असली बात यह है कि जिस सिस्टम में हम जी रहे हैं – वो कुछ लोगों के लिए एस्कैलेटर की तरह है और कुछ के लिए टूटी हुई सीढ़ी।
जो लोग ऐस्कैलेटर पर चढ़े हुए हैं – यानी जिन्हें प्रिविलेज मिला हुआ है – उन्हें पता भी नहीं चलता कि वो आगे बढ़ रहे हैं। बिना प्रयास के। और जो लोग सीढ़ी पर हैं – वो हर दिन मेहनत करते हैं बस उसी जगह पर खड़े रहने के लिए जहां एस्केलैटर वाले बिना कोशिश के पहुंच जाते हैं।
महिलाओं के साथ यही हो रहा है। अलग अलग रंग वाली महिलाओं के साथ और भी ज्यादा।
एक श्वेत पुरुष को एक डॉलर मिलता है – स्पैनिश महिला को 57 पैसे, अश्वेत महिला को 64 पैसे, ऐशियाई महिला को 75 पैसे । और यह गैप दशकों से है। बदला नहीं।
थकान असली है
यहां एक और सच्चाई है जो कम बोली जाती है।
जब दौड़ की कोई फिनिश लाइन नहीं हो – जब लाख कोशिशों के बाद भी हालात न बदलें – तो इंसान टूट जाता है। थक जाता है।
यही कारण है कि आज बहुत सी महिलाएं – खासकर 35-45 की उम्र में – वर्कफोर्स से बाहर जा रही हैं। यह आलस नहीं है। यह चुक जाना होता है -ताकत का निचुड़ जाना होता है। असली और गहरी।
गर्लबॉस फेमिनिजम का यही सबसे बड़ा झूठ था – यह मान लेना कि अगर महिलाएं वही सब करें जो पुरुष करते हैं, तो बराबरी आ जाएगी। पर जब सिस्टम ही टेढ़ा हो – तो उसमें सीधे खड़े होने की कोशिश काफी नहीं होती।
तो आगे क्या?
एक पुराना कॉलेज के दिनों का जोक है – “सोचो, अगर तुम्हारे पास एक वाइफ होती, तो कितना काम होता।”
यह मजाक उस दौर का है जब मर्द घर में बैठकर “लाइफ ऑफ दि माइन्ड” जीते थे – और घर का सब काम किसी और के जिम्मे था।
आज वो जोक अलग तरह से सुनाई देता है।
सोचो – अगर तुम्हें हर वक्त अपनी आइडेन्टिटी प्रूव नहीं करनी होती। अगर तुम्हारे जेन्डर या रंग या एक्सेन्ट की वजह से तुम्हें कमतर नहीं आंका जाता। अगर तुम बस… इंसान होते – बिना किसी लेबल के।
तब तुम क्या कर पाते? यही सोचने वाली बात है।
(मन्जू सिंह)




