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Real ‘Mardani’: महिला पुलिस अधिकारी ने बचाया था बच्चों को अंडरकवर बन कर

Real ‘Mardani’: आईपीएस अधिकारी मल्लिका बनर्जी का अंडरकवर ऑपरेशन, जिसने बचाए मासूम और तोड़े मानव तस्करी के गिरोह

भारत जैसे देश में अपराध अक्सर कागज़ी वैधता और सभ्य दिखने वाले चेहरों के पीछे छिप जाता है। कई बार प्रभावी पुलिसिंग वर्दी, सायरन और थाने से दूर शुरू होती है—गांव की पगडंडियों पर, धीमी बातचीतों में और भीड़ में घुल-मिल जाने के कठिन फैसले में।

साल 2016 में मल्लिका बनर्जी ने यही रास्ता चुना। उन्होंने अपनी आधिकारिक पहचान को पीछे छोड़ते हुए छत्तीसगढ़ में एक घर-घर सामान बेचने वाली सेल्सवुमन का रूप धारण किया। न कोई फिल्मी अंदाज़, न कोई नाटकीय संवाद—सिर्फ धैर्य, निरंतरता और यह गहरी शंका कि “नौकरी” के नाम पर बच्चे कहीं गुम हो रहे हैं।

यह कहानी सिर्फ एक सफल ऑपरेशन की नहीं, बल्कि उस राष्ट्रीय संकट की चेतावनी थी जो आज भी खत्म नहीं हुआ है।

बिना वर्दी, बिना सुरक्षा: 2016 का अंडरकवर मिशन

छत्तीसगढ़ में तैनाती के दौरान बनर्जी ने देखा कि कई परिवार अपने बच्चों के शहर में नौकरी पर जाने की बात करते थे, लेकिन वे बच्चे कभी लौटकर नहीं आते थे। शिकायतें अधूरी रहतीं, डर या दबाव में वापस ले ली जातीं। पारंपरिक पुलिस जांच इस जाल को तोड़ने में नाकाम हो रही थी।

ले लिया बड़ा फैसला

तब उन्होंने असाधारण फैसला लिया—वह अंडरकवर बन गईं।

सेल्सवुमन बनकर वह गांव-गांव गईं, लोगों से खुलकर बात की, वे सवाल पूछे जो वर्दी में संभव नहीं थे। धीरे-धीरे एक पैटर्न सामने आया। कुछ तथाकथित “प्लेसमेंट एजेंसियों” के नाम बार-बार सामने आ रहे थे। कागज़ों पर वे वैध दिखती थीं, लेकिन असल में वे बच्चों को बड़े शहरों में बंधुआ मजदूरी और शोषण के लिए भेज रही थीं।

इस जानकारी के आधार पर उन्होंने अपनी टीम के साथ पुराने मामलों को दोबारा खोला और लगभग 25 अवैध प्लेसमेंट एजेंसियों का नेटवर्क ध्वस्त कर दिया।
20 से अधिक बच्चों को छुड़ाया गया—ऐसे जीवन से, जिसे उन्होंने कभी चुना ही नहीं था।

कोई तालियां नहीं बजीं, कोई फिल्मी क्लाइमेक्स नहीं था—सिर्फ केस डायरी, चार्जशीट और यह कठोर सच्चाई कि तस्करी कितनी साधारण शक्ल में सामने आती है।

फिल्मी नहीं, वास्तविक संघर्ष

अक्सर उनके काम की तुलना फिल्म ‘मर्दानी’ से की जाती है, लेकिन हकीकत कहीं ज्यादा सिहराने वाली है। यहां खलनायक खुलेआम नहीं आते। वे पड़ोसी, परिचित या नौकरी दिलाने वाले एजेंट बनकर आते हैं। वे जानते हैं कि गरीबी और मजबूरी उनका सबसे बड़ा हथियार है।

बनर्जी के ऑपरेशन ने यह उजागर किया कि सबसे खतरनाक अपराध अक्सर सबसे सम्मानजनक मुखौटे पहनकर आते हैं।

छत्तीसगढ़ से देशभर तक गूंज

2016 में जो पैटर्न सामने आया था, आज वह देशभर में दिख रहा है।

गुजरात में हालिया संयुक्त पुलिस कार्रवाई में एक अंतरराज्यीय गिरोह का पर्दाफाश हुआ और एक नवजात शिशु को हैदराबाद ले जाते समय बचाया गया।

झारखंड में पुलिस ने बिहार, पश्चिम बंगाल, ओडिशा और उत्तर प्रदेश में सक्रिय बाल अपहरण गिरोह का भंडाफोड़ किया और 12 बच्चों को छुड़ाया।

कोलकाता में सांस्कृतिक कार्यक्रमों में “ऑर्केस्ट्रा मंडली” बनकर घूमने वाले लोगों ने एक नाबालिग को अगवा किया, जिसे बाद में बचाया गया।

इन मामलों से स्पष्ट है कि तस्करी अंधेरे में नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्थानों, मेलों, नौकरी बाजारों और सामाजिक आयोजनों के बीच फल-फूल रही है।

आंकड़े वास्तव में डराने वाले हैं

Centre for Legal Action and Behaviour Change (C-LAB) की रिपोर्ट के अनुसार अप्रैल 2024 से मार्च 2025 के बीच 53,651 बच्चों को बाल श्रम और तस्करी से मुक्त कराया गया। 24 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में 38,388 एफआईआर दर्ज हुईं।

उत्तर प्रदेश, बिहार, तेलंगाना, राजस्थान और दिल्ली जैसे राज्य प्रमुख हॉटस्पॉट बनकर उभरे हैं। यहां छिटपुट छापों से नहीं, बल्कि दीर्घकालिक पुनर्वास और कड़ी निगरानी से ही बदलाव संभव है।

दिल्ली में 2025 के पहले पांच महीनों में बाल श्रम से बचाए गए बच्चों की संख्या में 51% वृद्धि दर्ज की गई। अधिकांश बच्चे झारखंड, बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान से लाए गए थे।

संस्थाओं पर बढ़ता दबाव

एनसीपीसीआर (National Commission for Protection of Child Rights) ने छह महीनों में 2,300 से अधिक बच्चों को बचाने की जानकारी दी है। सर्वोच्च न्यायालय ने दिल्ली में बाल तस्करी को “बेहद व्यापक” बताते हुए केंद्र सरकार से विस्तृत रिपोर्ट मांगी है और मुकदमों में तेजी लाने की आवश्यकता पर बल दिया है।

सुर्खियों के पीछे छिपी पीड़ा

आंकड़े केवल संख्या बताते हैं, दर्द नहीं।
तस्करी से मुक्त कराए गए बच्चों के मन में अक्सर गहरे जख्म रह जाते हैं—डर, अविश्वास, टूटी पढ़ाई और मानसिक आघात। बचाव सिर्फ पहला कदम है। असली चुनौती है—परामर्श, पुनर्वास और समाज में सम्मानजनक पुनर्स्थापन।

एक संदेश, जो आज भी प्रासंगिक है

मल्लिका बनर्जी का 2016 का अंडरकवर मिशन कोई बीती कहानी नहीं, बल्कि आज के संकट का प्रारंभिक अध्याय है। उनका साहस यह याद दिलाता है कि मानव तस्करी के खिलाफ लड़ाई सिर्फ पुलिस ऑपरेशन नहीं, बल्कि सामाजिक जागरूकता, त्वरित न्याय और निरंतर संरक्षण की मांग करती है।

सुखद सत्य यह भी है कि ये संघर्ष अभी जारी है।

(अर्चना शैरी)

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