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Monday, March 30, 2026

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Dr Menka Tripathi writes: “चुड़ैल” शब्द की असली कहानी : भाषा-विज्ञान की नज़र से

मेरे मोबाइल में लिखा हुआ आ रहा है क्या सोच रही होतो अभी मैं चाय पी रही , तो सामने की छत पर एक स्त्री अपने लंबे बाल खोल सामने छत पर आई है। उसके बाल इतने घने और चमकदार थे कि मन ने सहज ही कहा—“अरे, बिल्कुल चुड़ैल जैसी!”
और उसी क्षण भीतर से एक और आवाज़ आई—क्या मैंने गलत कहा?
पर जब भाषा-विज्ञान की दृष्टि से सोचने लगी, तो लगा कि शायद मैं बिल्कुल भी गलत नहीं हूँ। दरअसल, मैं एक प्राचीन शब्द की जड़ को सही भाव में पकड़ रही थी।
‘चुड़ैल’ शब्द का जन्म संस्कृत के “चूड़ा” शब्द से हुआ है। संस्कृत में चूड़ा का अर्थ है बालों का ऊपरी भाग, जूड़ा या केश-गुच्छ। यही “चूड़ा” बाद में श्रृंगार और सौंदर्य का प्रतीक बना। हम जानते हैं कि “चंद्रचूड़” का अर्थ है—जिसके सिर पर चंद्रमा सुशोभित हो, और “सीता की चूड़ामणि” भी उसी अलंकरण का द्योतक है। विवाह संस्कारों में “चूड़ा-कर्म” नामक एक संस्कार भी होता है, जो सौभाग्य और शुद्धता का प्रतीक है। सीता जी की चूड़ा मणि यानि हेयर क्लिप स्पष्ट है कि “चूड़ा” शब्द में कोई नकारात्मकता नहीं थी, बल्कि इसमें सुसज्जा और आदर की भावना समाई हुई थी।
अब इसमें जुड़ता है प्रत्यय “एल”। भाषा-विज्ञान के अनुसार, यह प्रत्यय “वाला” या “वाली” के अर्थ में प्रयुक्त होता है। भोजपुरी, अवधी, मैथिली और अन्य लोकबोलियों में “एल” या “ल” प्रत्यय का बहुत सुंदर और सहज प्रयोग होता है—जैसे गुस्सैल, बिगड़ैल, खपरैल, मूँछैल, दँतैल और रखैल आदि।
गुस्सा करने वाला हो तो गुस्सैल, बात-बात पर बिगड़ने वाला हो तो बिगड़ैल, बड़ी मूँछों वाला हो तो मूँछैल, दाँत निकले हों तो दँतैल, और अगर लम्बे वाली तो चुड़ैल!
अब बताइए, इसमें बुरा मानने जैसी क्या बात हुई?
दरअसल, “चूड़ा + एल” का अर्थ ही है “चूड़ा वाली” — अर्थात लंबे बालों वाली स्त्री। यह शब्द मूलतः स्त्री-सौंदर्य और आकर्षण का प्रतीक रहा होगा। परंतु समय के साथ समाज ने लंबे, खुले बालों और स्वतंत्र स्वभाव वाली स्त्री को डर का प्रतीक बना दिया। जो औरत बाल बाँधने की बजाय खुले रखती, जो अपने ढंग से सोचती और समाज की संकीर्ण सीमाओं से परे जाती, उसे ‘भिन्न’ कहा गया। और धीरे-धीरे वही “भिन्नता” लोगों के मन में “भय” बन गई। इस तरह एक सुंदर और स्वाभाविक शब्द “चुड़ैल” धीरे-धीरे डरावनी छवि का पर्याय बन गया।
भाषा का यही तो कमाल है—शब्द तो वही रहते हैं, लेकिन उनके अर्थ समाज बदल देता है। एक समय था जब “चुड़ैल” स्त्री के श्रृंगार और सुषमा का प्रतीक रही होगी; आज वही शब्द किसी नकारात्मक अर्थ में प्रयुक्त होता है। पर असल में यह शब्द नहीं, हमारी दृष्टि बदली है।
भाषा-विज्ञान हमें यह सिखाता है कि हर शब्द अपने भीतर एक पूरा इतिहास छिपाए बैठा है। इसलिए अगली बार कोई आपको “चुड़ैल” कहे तो मुस्कुराइए, क्योंकि वह अनजाने में आपको “चूड़ा वाली”, यानी “लंबे बालों और खुले विचारों वाली स्त्री” कह रहा है। और क्या यही तो हर युग की सबसे सुंदर चुड़ैल नहीं होती जो अपने बालों की तरह अपने विचार भी खुला रखती है!
तो अब अगर कोई गुस्सा करे, तो समझिए वो “गुस्सैल” है; कोई बात-बात पर बिगड़े, तो “बिगड़ैल” है; और अगर कोई स्त्री स्वतंत्र होकर सोच ले, तो उसे “चुड़ैल” कहने में हर्ज ही क्या है?
बस, अगली बार कोई यह शब्द बोले तो जरा मुस्कुराकर कहिए—
> “हाँ भई, बाल भी मेरे हैं और विचार भी… अब क्या कर लोगे!”वैसे खुले बाल वाली को चुड़ैल कहना खतरे से खाली नहीं!
आपको भी भाषा विज्ञान रोचक लगने लगा हो तो जरूर प्रतिक्रिया दें आप सोनाक्षी को चुड़ैल कहे बिल्कुल बुरा न लगेगा यदि वह यह पोस्ट पढ़े
(डॉ. मेनका त्रिपाठी)

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