Dr Sushma Sengar Writes: सीधी सी बात है, इसमें समझने को ज्यादा कुछ नहीं -जैसे काकरोच काकरोच होते हैं, इन्सान नहीं, ठीक वैसे ही गालियाँ गालियाँ होती हैं, प्रोटेस्ट नहीं !
आजकल चर्चा गालियों पर है कोई इन्हें सही बता रहा कोई ग़लत, कोई बदला कह रहा कोई गुस्सा तो कोई यों भी कह रहा कि ये gen z है ये ऐसे ही बात करती है। गालियों के विरोधियों को ताना दिया जा रहा कि जब आप विपक्षियों पर भद्दे मीम्स बनाते थे तब तो ख़ुश होते थे। या समाज में आपके पिता भाई जब गालियाँ बोलते थे तब आप चुप थे क्यों ?
लब्बोलुआब यह कि गालियों के प्रति कहीं ख़ुशी कहीं ग़म का माहौल है।
मुझे गालियों से हमेशा परहेज रहा है। घर में साला शब्द तक ban था सो भैया लोग दोस्तों के बीच ही इसे इस्तेमाल करते थे। पिता जी की प्रिय गाली थी ‘ हरामखोर’ जिसे वो गुस्से में कामचोर के अर्थ में देते थे। उस दिन मम्मी से उनका झगड़ा ज़रूर होता था।
मम्मी, बच्चों के सामने इस भाषा के सख़्त ख़िलाफ़ थी। किसी बड़े के सामने पापा ख़ुद ही कभी अशालीन भाषा बोलते नहीं दिखे।
आगे के दिनों में मेरे बच्चे भी लगभग इस ही pattern पर रहे ससुरालियों की भाषा मेरे मायके वालों से भी ज़्यादा साफ़ सुथरी अनुशासित और शालीन थी।
पति जहाँ जॉब करते थे वहाँ भी साथ संग के लोग अच्छे ख़ासे पढ़े लिखे थे। एक ख़ास तरह का सोफ़ेस्टिकेटेड living स्टाइल था सो gatherings में foul भाषा का प्रयोग न के बराबर था। बच्चों की परवरिश आसान रही।
अब आज के समय की बात करते है। भाषा का बेख़ौफ़ और बेलिहाज तौर जो इस आंदोलन के माध्यम से सामने आया है वो मुझे न तो चिंतित करता है न डराता है। क्योंकि आगे के दिनों में इनको ही एक दूसरे से बात करनी है तो सब एक ही पटरे पर खड़े होंगे तो इनके लिए संवाद आसान होगा।
थोड़ा दुख ज़रूर है वो भी इस बात का कि जो लोग इस भाषा के पक्ष में आ रहे हैं उनमें ज़्यादातर वो लोग हैं जिन्होंने अपने बच्चों को अक्सर ख़राब भाषा या व्यवहार के लिए टोका ही होगा।
दो राजनीतिक दल किस क़दर नीचे गिर कर एक दूसरे के साथ interact कर रहे हैं पसंद न आने पर भी हम उसे इग्नोर कर सकते हैं। उन्हें पता है वो क्या कर रहे हैं किंतु क्या ठीक यही बात इन बच्चों पर भी लागू होती है।
एक बात और अभिजीत, सौरभ, नेहा, सोनम अभिषेक और कुछ और भी neet aspirant जो आंदोलन में जुड़े थे उनकी भाषा ऐसी क्यों नहीं थी।
ये भाषा banner या slogans ज़्यादातर उनके थे जिनका नीट से कुछ लेना देना नहीं था।
पक्ष लीजिये पर सोचिए कि आप किसका पक्ष ले रहे हैं। और जब यह बात चल ही निकली है तो इस पर खूब चर्चा भी कीजिए।
बच्चों की बलि देकर अपने राजनैतिक मक़सद सिद्ध मत करिये। कम देखें
(डॉ सुषमा सेंगर)



