दक्षिणी दिल्ली का छतरपुर एरिया, जहाँ मेट्रो स्टेशन के पास था ये ढाबा. यहीं पहली बार मिला था मानव संजना से. दिसंबर की उस ठंडी रात को कॉफ़ी का गरमागर्म कप था मानव के हाथ में.
कोने में दो कुर्सियों के बीच रखी थी एक टेबल जिस पर रखा अपना कप मानव ने. खाली कुर्सी पर बैठने से पहले उसे पता था कि यही एक कुर्सी खाली है यहां.
बिलकुल पास वाली याने कि सामने वाली कुर्सी में बैठी हुई संजना किसी किताब में खोई हुई थी.
मानव ने आदतन अपने अंदाज़ में पूछ लिया -‘क्या मैं यहाँ बैठ सकता हूँ?’
‘बैठने के बाद पूछ रहे हैं’ – किताब से सर हटा कर संजना मुस्कुराती हुई बोली
– ‘आराम से बैठिये पर मुझे डिस्टर्ब मत कीजियेगा!’
-‘बिलकुल नहीं -कॉफ़ी पीते समय मैं खुद काफी बिजी हो जाता हूँ!’
फिर थोड़ी देर की ख़ामोशी के बाद शुरू हुई उनकी बात. फिर बड़ी देर तक होती रही उनकी बात और ठहाकों -मुस्कुराहटों के बीच चला काफी का एक और दौर.
ये दिलचस्प शुरुआत दोनो के वहाँ से जाने के बाद भी चली उनके साथ.
अगले कुछ महीने उनकी बातों के बीच हमेशा कोई तीसरा रहा – वो था मोबाइल फ़ोन जिसके सहारे होती थी दोनो की बात. कुछ समय बाद ही उनको लगने लगा जैसे दोनों अधूरे से थे एक-दूजे के बिना.
फिर एक दिन तीन से दो ही रह गए. मानव और उसका मोबाइल फ़ोन, बस. संजना का नंबर बंद हो चुका था. मानव परेशान था और हैरान भी -आखिर कहाँ चली गई संजना ? वो ठीक तो होगी न?
कुछ दिनों में मानव जैसे टूट सा गया। संजना के बिना कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा था उसे. क्या करूँ – कहाँ से ढूंढ लाऊँ उसे -अक्सर वो सोच में डूब जाता.
जिन्दगी मगर चलती रही. फि आया जून का महीना और तब आया एक सन्देश मानव के फोन पर – ‘भूल जाओ संजना को -वो तुम्हारे लिए कभी थी ही नहीं!’
बात समझ नहीं आई मानव को – ये अनजान नंबर यूज़ में भी नहीं था. फोन करने से कोई फायदा नहीं हुआ.
पर एक बात तो पक्की थी -संजना ठीक थी – दूर ही सही पर वो इसी दुनिया में थी कहीं- शायद कोई मजबूरी चल रही थी उसके साथ. ये नंबर उस मजबूरी का ही था या संजना का -मानव समझ नहीं पाया.
मैं उसे ढूंढूंगा -मैं उसे ढूंढ कर रहूंगा – मानव ने उसी दिन से संजना को ढूंढना शुरू किया।
और फिर याद आया उसे संजना ने एक बुक दी थी उसे पढ़ने के लिये. खोल के देखा तो उसमें एक विजिटंग कार्ड था. कंपनी के नाम पर लिखा था रोशाद एक्स. बिना एड्रेस वाले इस विजिटिंग कार्ड के साथ एक नंबर भी लिखा था. नंबर अपने मोबाइल पर डायल किया तो पता चला ये तो संजना का नंबर था. मतलब?
मतलब – संजना कोई थी ही नहीं -याने संजना उसका असली नाम नहीं था। तो फिर कौन थी वो?
सच कहीं बहुत दूर मौजूद था मानव की पहुंच से. दरअसल एक अंडरकवर एजेंट थी संजना. एक बड़े क्रिमिनल नेटवर्क के पीछे लगाया गया था उसे.
वो उस दिन भी अपने मिशन पर थी जब पहली बार मिली थी मानव से.
वहां उस दिन मानव बस एक कवर था उसके लिए. ये जानकर मानव को लगा जैसे कहीं भीतर कुछ टूट गया हो.
लेकिन प्यार की कहानी ऐसे ही खत्म तो नहीं हो जाती.
कुछ हफ्तों बाद आई एक गहरी काली रात. दिल्ली के मुनीरका स्थित मानव के घर के दरवाजे की घंटी बजी – बाहर हो रही तूफानी बारिश के बीच नज़र आया एक साया – वो संजना थी – खून से लथपथ !
मानव समझ नहीं पाया- दिल ने चाहा कि बस संजना की मासूम सूरत देखता रहे – दिमाग ने कहा उसे जल्दी से अंदर ले जाए और उसको फर्स्ट ऐड दे. उसने दिमाग की बात मानी. फिर वर्मा अंकल को फोन लगा दिया.
डॉक्टर वर्मा बड़े पापा थे मानव के. वो सिचुएशन की संजीदगी को समझ गये. दौड़े चले आये रात के एक बजे. बिस्तर पर तेज बुखार में तप रही थी संजना. एक छोटी सर्जरी सी करनी पड़ी बड़े पापा को. जरूरी दवाएं और कुछ हिदायतें देकर गए वो.
सुबह नहीं, अगले दिन दोपहर को होश आया था संजना को. बिस्तर पर अपने ऊपर खींच लिया उसने मानव को – ‘तुम न होते तो शायद आज मैं नहीं होती. मैं बच कर तो आ गई तुम्हारे पास..लेकिन उनकी गोली से खुद को नहीं बचा न सकी.’
हुआ ये था कि उस ड्रगडीलर को पकड़वाने के बाद सारा गैंग उसके पीछे पड़ गया था.
वो लोग किसी हाल में उसे जिन्दा नहीं छोड़ना चाहते थे. पर गोली लगने के बाद भी संजना किसी तरह अपने को बचाते हुए मानव के घर पहुंचने में सफल रही थी.
मानव ने तुरंत फैसला कर लिया – संजना के कंधे थाम कर उससे कहा – ‘मैं तुम्हारे साथ हूँ, तुम अकेली नहीं हो.’
दोनों घर से निकल गए. एक जगह से दूसरी जगह भागते रहे, छिपते रहे. पूरे तीन माह वापस नहीं आये दिल्ली.
वैसे भी वर्क फ्रॉम होम चल रहा था मानव का. छुट्टी की कोई चिंता नहीं थी.
संजान का साथ क्या मिला, पुराना मानव जिन्दा हो गया. वो फिर से शायरी लिखने लगा -पर अब खुशियों का सफेद और मुहब्बत का लाल रंग था उसकी शायरी में.
जिसे चाहा हो जिंदगी में उसका साथ मिल जाए तो ढेर सारा प्यार जागने लगता है दिल के भीतर से.
और फिर एक दिन कानपुर में मौसी के घर एक और सच बताया संजना ने. हैरान रह गया मानव उससे भी ज्यादा हैरान हुई संजना जब उसे पता चला शान मानव का बड़ा भाई है.
ये बात मानव ने ही उसको बताई जब उसने अपने फ़ोन पर उस ड्रग डीलर की फोटो दिखाई.
अब समझ में आया क्यों शान उसे अपना एड्रेस कभी नहीं बताता था.
याने कि शान ने पिछले छह माह से इसलिए अपना फ़ोन बंद कर रखा था क्योंकि वो जेल में था.
घर से बाहर निकल कर उसने भाई को फोन लगाया..लेकिन नंबर अभी भी बंद था.
मौसी के घर रहना सेफ नहीं होगा क्योंकि शान को मौसी का घर पता है. दोनों ने भोपाल की ट्रेन पकड़ ली.
भोपाल में था उसका बचपन का दोस्त वैभव सोलंकी. दोनों ठहर गए उसके घर कुछ दिनों के लिए.
तीसरे ही दिन आ गया फोन -ये शान का ही फोन था – कहाँ है तू? तेरे साथ है न वो लड़की?
– कौन भैया? आप किस लड़की की बात कर रहे हैं?
देख मुझे सब पता है -सीधे सीधे बता तू अभी कहाँ है?
-भैया, आपकी आवाज़ नहीं आ रही – बोलकर फोन काट दिया मानव ने.
संजना आकर उससे लिपट गई. ‘परेशान क्यों हो – किसका फोन था?’ – उसने बता दिया, ‘भैया का फोन था – मेरे और तुम्हारे बारे में पूछ रहे थे.’
अब एक सवाल मानव के सामने खड़ा हो गया था – एक तरफ उसका सेभाई जिसने मम्मी डैडी के जाने के बाद बचपन से उसे बहुत प्यार पाला था. वो भी शान को जान से ज्यादा प्यार करता था, लेकिन अब संजना आ गई थी दोनों के बीच में. अब क्या होगा ?
दो दिन बाद सुबह सुबह वैभव की डोर बेल बजी उसकी वाइफ ने दरवाजा खोला.
अंदर आवाज सुनाई दी मानव को -शान यहाँ आया है उसे ढूंढते हुए. प्रज्ञा ने बता दिया -वो अंदर हैं -सो रहे हैं.
दोनों जल्दी से पीछे आंगन की तरफ भागे और वहां सीढ़ियां चढ़ कर फर्स्ट फ्लोर पहुंचे. बालकनी से किसी तरह नीचे कूद कर गली में भाग निकले मानव और संजना.
शायद ये फाइनल चैप्टर था इस लव स्टोरी का, संजना सोच रही थी – क्योंकि वो जानती थी आज उसकी जान नहीं बचने वाली. लेकिन मानव को कुछ न हो बस – मन ही मन भगवान से प्रार्थना कर रही थी वो.
और फिर चलने लगी गोलियां. मानव डर कर जमीन पर लेट गया. लेकिन संजना ने अपने छोटे से पर्स से एक मिनी पिस्टल निकाल ली और ..
नहीं -मानव जोर से चीखा – उसने देखा संजना ने खुद को गोली मार ली थी.
मानव की गोदी में सर रखे संजना मुस्कुराई –
अब जाते-जाते झूठ नहीं बोलूंगी तुमसे – मैं संजना नहीं तबस्सुम हूँ -तुम्हारे भाई की क्राइम पार्टनर -उसे जेल भेज कर सारा पैसा हड़प जाना चाहती थी ..पर ऐसा हो नहीं पाया..प्लीज़, माफ़ कर देना मुझे !
हॉस्पिटल में डॉक्टर ने बताया कि खून ज्यादा बह जाने की वजह से पेशेंट को बचा नहीं पाए.
इतनी बड़ी दुनिया में अकेला रह गया था मानव- शान का भी कोई अतापता न था.
लेकिन जिंदगी थी कि अब भी चली जा रही थी.
कुछ महीनों बाद एक पार्सल आया मानव के नाम. उसमे थी एक पेन ड्राइव. वीडियो चला के देखा तो उसका मुँह खुला का खुला रह गया –
वीडियो में संजना मुस्कुरा रही थी – मैं ज़िंदा हूँ ..किसी दिन जरूर मिलूंगी तुमसे..और फिर सब कुछ बताउंगी तुमको..अपना ध्यान रखना!
अजब है जिंदगी – समझ में कभी नहीं आती – मानव सोचता रह गया ! संजना लौट आई मगर आई नहीं..आखिर क्यों?
(सुमन पारिजात)



