Story: विक्रम ने नैना की ओर देखा, जिसकी आँखों में अब नफ़रत नहीं, बल्कि पश्चाताप के आँसू थे। उसने विक्रम का हाथ थाम लिया..
पति ने “तलाक” की अर्जी दी। “सुनवाई” के दिन 7 साल की बेटी “अचानक” जज से बोली, “अंकल, क्या मैं आपको एक, ऐसा, राज़ बता, सकती हूँ, जो मम्मी भी नहीं जानती?”… और ये सुनते ही पिता, के चेहरे का रंग, उड़ गया—आख़िर उस मासूम ,को क्या पता था..?
सोमवार की सुबह थी..।
मुंबई का आसमान धूसर था, जैसे किसी ने फैमिली कोर्ट नंबर 3 की खिड़कियों पर धूल की पतली परत बिछा दी हो।
विक्रम सहगल दाईं ओर की बेंच पर बैठा था।
सफ़ेद शर्ट पैंट में दबाई हुई थी, मगर कॉलर पूरी तरह सिकुड़ा हुआ।
उसके हाथ बार-बार बंद पड़े मोबाइल को कसकर पकड़ते, फिर ढीला छोड़ देते।
उसके सामने बैठी थी उसकी पत्नी — नैना सहगल।
हल्का सा मेकअप, मगर आँखें लाल और सूजी हुई।
एक हाथ में काग़ज़ों की फाइल थी, दूसरा हाथ उसने अपनी बेटी की उँगलियों में कसकर थाम रखा था।
बच्ची का नाम तृषा था — सात साल की।
उसके बाल दो चोटियों में बँधे थे, नीले रबर बैंड लगे हुए।
वह कोर्टरूम को कभी उत्सुकता से, कभी डर से देख रही थी।
फिर उसकी नज़र अपने पापा पर गई।
विक्रम ने तुरंत चेहरा दूसरी ओर घुमा लिया —
मानो उन आँखों से मिलते ही उसका दिल पिघल जाएगा।
जज वर्मा अंदर आए।
उनकी आवाज़ शांत थी, मगर ठंडी और औपचारिक।
“आज अदालत विक्रम सहगल द्वारा दायर तलाक़ की याचिका पर सुनवाई कर रही है।
मुख्य विवाद बच्ची की कस्टडी और भरण-पोषण को लेकर है।”
विक्रम खड़ा हुआ।
उसकी आवाज़ तेज़ थी, जैसे उसने पूरी रात इसका अभ्यास किया हो।
“माय लॉर्ड, मैं तलाक़ चाहता हूँ क्योंकि मेरी पत्नी मुझ पर अब भरोसा नहीं करती।
हर बात पर नियंत्रण, हर समय शक।
मैं इस दबाव में नहीं जी सकता।”
नैना के होंठों पर एक कड़वी मुस्कान उभरी।
आवाज़ काँप रही थी, मगर शब्द धारदार थे।
“बिना वजह शक?
रात को बारह-एक बजे आप किसे मैसेज करते हैं?
आप सच में ऑफिस ट्रिप पर होते हैं या किसी और के साथ?
मेरे पास सबूत हैं।”
कोर्टरूम का माहौल भारी हो गया।
विक्रम ने सूखी लार निगली।
एक पल जज की ओर देखा, फिर नज़रें फ़र्श पर गड़ा दीं।
नैना ने फाइल खोली।
प्रिंट किए हुए मैसेज, होटल की रसीदें।
विक्रम ने तुरंत सफ़ाई दी:
“ये सब गलतफ़हमी है। वो सिर्फ़ बिज़नेस क्लाइंट है।
होटल कंपनी ने बुक किया था।”
जज वर्मा ने हल्के से हथौड़ा बजाया और बच्ची की ओर देखा।
“तृषा, क्या तुम कुछ कहना चाहती हो?
तुम किसके साथ रहना चाहोगी?”
तृषा ने मम्मी की साड़ी का किनारा कसकर पकड़ लिया।
धीमे से बोली:
“मैं… मैं चाहती हूँ कि मम्मी रोएँ नहीं।”
फिर अचानक, वह एक कदम आगे बढ़ी।
उसने सीधे जज की आँखों में देखा।
आवाज़ छोटी थी, मगर साफ़ और दृढ़।
“अंकल…
क्या मैं आपको एक ऐसा राज़ बता सकती हूँ…
जो मम्मी नहीं जानती?”
पूरा कोर्टरूम सन्नाटे में डूब गया।
विक्रम जैसे जम गया।
उसके चेहरे का रंग पल भर में उड़ गया, गाल सफ़ेद पड़ गए।
वह झट से खड़ा हो गया।
“तृषा— नहीं… मत बोलो…”
लेकिन तृषा ने पीछे मुड़कर नहीं देखा।
उसकी आँखें अब भी जज पर टिकी थीं —
मासूम, मगर अजीब तरह से गंभीर।
फिर उसने हल्का सा सिर हिलाया,
जैसे वह मन बना चुकी हो।…
तृषा की बात सुनकर कोर्टरूम में ऐसी खामोशी छा गई कि घड़ी की सुइयां भी भारी लगने लगीं। विक्रम अपनी कुर्सी पर ढह सा गया, उसका चेहरा सफेद पड़ चुका था।
जज वर्मा ने चश्मा उतारा और मेज़ पर झुककर बड़ी नरमी से पूछा, “बेटा, वो कैसा राज़ है? डरो मत, यहाँ सब आपकी मदद के लिए हैं।”
तृषा ने अपने छोटे से स्कूल बैग की चेन खोली और एक मुड़ा-तुड़ा सफेद लिफ़ाफ़ा निकाला। वह आगे बढ़ी और कांपते हाथों से उसे जज की मेज़ पर रख दिया।
”अंकल, पापा मम्मी से छिपकर हर रात रोते हैं। वो अलमारी के पीछे एक फोटो रखते हैं और कहते हैं कि ‘सॉरी माँ, मैं आपको बचा नहीं पाया’…”
नैना की आँखें फटी की फटी रह गईं। “माँ? लेकिन विक्रम, तुम्हारी माँ तो सालों पहले…”
विक्रम ने अपना चेहरा हाथों में छिपा लिया और फूट-फूट कर रोने लगा।
दफ़्न हुआ कड़वा सच
जज ने लिफ़ाफ़ा खोला। उसमें अस्पताल की पुरानी रसीदें और एक डॉक्टर की रिपोर्ट थी।
विक्रम की आवाज़ रुंधे हुए गले से निकली, “नैना, तुम्हें याद है पाँच साल पहले जब मेरी माँ हमें छोड़कर चली गई थीं? तुमने सोचा था कि वो किसी रिश्तेदार के पास गईं, लेकिन हकीकत में उन्हें अल्जाइमर (भूलने की बीमारी) थी। वो घर से निकल गईं और मुझे कभी नहीं मिलीं।”
उसने अपनी जेब से एक फटा हुआ अखबार का टुकड़ा निकाला।
“पिछले छह महीनों से मैं उन्हें एक चैरिटी अस्पताल में ढूँढ पाया हूँ। वो मुझे पहचानती भी नहीं हैं। मैं रात-रात भर उनके पास बैठता था। मैं तुम्हें बताना चाहता था, लेकिन मुझे डर था कि तुम मुझे कभी माफ नहीं करोगी कि मैंने अपनी बीमार माँ को अकेले छोड़ दिया था। उन पर होने वाला खर्च… वो होटल के बिल नहीं, अस्पताल की दवाइयों के पैसे थे।”
नैना सन्न रह गई। जिसे वह ‘अफेयर’ और ‘धोखा’ समझ रही थी, वह दरअसल एक बेटे का अपनी मरती हुई माँ के प्रति प्रायश्चित (Guilt) था। विक्रम का ‘शक’ वाला व्यवहार दरअसल उसका डर था कि कहीं नैना को उसकी इस नाकामी का पता न चल जाए।
अदालत का फैसला
जज वर्मा ने गहरी सांस ली। उन्होंने अपनी फाइल बंद की और दोनों की तरफ देखा।
”इस अदालत में अक्सर लोग नफ़रत लेकर आते हैं, लेकिन आज एक सात साल की बच्ची ने वो दीवार गिरा दी जो दो बड़े लोग अपने अहंकार और डर से नहीं गिरा पाए। विक्रम, आपकी गलती धोखा नहीं, संवाद की कमी (Lack of Communication) थी। और नैना, शक ने उस सच को देखने ही नहीं दिया जो आपके सामने था।”
कोर्ट का फैसला:
जज ने तलाक की अर्जी को खारिज कर दिया।
उन्होंने दोनों को ‘काउंसलिंग’ और एक-दूसरे को समझने के लिए 6 महीने का समय दिया।
कोर्ट ने आदेश दिया कि विक्रम अपनी माँ को घर लेकर आए, ताकि नैना और वह मिलकर उनकी सेवा कर सकें।
कहानी का अंत
कोर्टरूम से बाहर निकलते समय, शाम की सुनहरी धूप खिड़की से अंदर आ रही थी। विक्रम ने झुककर तृषा को गोद में उठा लिया।
तृषा ने उसके कान में फुसफुसाया, “पापा, अब आपको छिपकर रोना नहीं पड़ेगा न?”
विक्रम ने नैना की ओर देखा, जिसकी आँखों में अब नफ़रत नहीं, बल्कि पश्चाताप के आँसू थे। उसने विक्रम का हाथ थाम लिया। मुंबई की उस भीड़भाड़ वाली सड़क पर, एक टूटता हुआ परिवार फिर से जुड़ने की राह पर चल पड़ा था।
(अज्ञात वीरा)



