सुलक्षणा पंडित के कुछ किस्से सुने थे कि एक प्रतिभाशाली अभिनेत्री – गायिका थीं, जतिन – ललित की बहन थीं और संजीव कुमार के इकतरफा प्रेम में थीं। पर, इससे अधिक कभी जाना सुना नहीं। इनके गाए गीत तो नहीं ही सुने थे और यदि कभी सुना भी हो तो पुराने दौर की किसी अन्य प्रसिद्ध गायिका की आवाज समझती थी। परसों उनके देहांत के बाद उनसे जुड़े पोस्ट अचानक से सामने आने लगे और जितना जाना, उतना दांतों तले उंगली दबाने वाले तथ्य सामने आए।
ये भी जाना कि एक प्रतिष्ठित संगीत घराने की लड़की को फिल्म जगत की राजनीति और असफल प्रेम ने कितना तोड़ दिया कि एक दीप अपने पूरे प्रकाश को बिखेरने से पहले ही बुझ गया। एक तारा जिसे सूर्य बनना था, एक धूमकेतु बनकर रह गया। लेकिन इससे भी ज्यादा दुख इस बात ने दिया कि सुलक्षणा को हम जान सकें, इसके लिए उन्हें मरना पड़ा। न न, मैं जानती हूँ कि वह अपनी आयु पूरी करके संसार से गई हैं, कि इस मृत्युलोक में हमसब मरने के लिए आए हैं लेकिन बुझने से पहले दीए का पूरा जलना तो दीए का अधिकार है न?
हमारे आसपास ऐसे कितने लोग हैं जो प्रतिभा से, संभावना से भरे हैं, जिन्होंने अपनी सुन्दर चमक बिखेरी है लेकिन उन्हें कभी थोड़ी भी प्रशंसा, थोड़ी भी सराहना नसीब नहीं होती। यहीं इस पटल पर कितने – कितने बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं, हिमखंड की तरह हम जिनका केवल ऊपरी फलक देख पाते हैं। क्या आपको नहीं लगता कि हमें शब्दों को बरतने में इतना कृपण नहीं होना चाहिए। कौन जाने हममें से कौन कल हमारे बीच में न रहे।
क्या पता हमारी जरा सी प्रशंसा किसी को अपने सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन के लिए प्रेरित करे। थोड़ी प्रशस्ति के अधिकारी तो सभी हैं न? ताकि एक संतुष्टि भरी मुस्कान हमारे स्वजनों, हमारे प्रियपात्रों के चेहरे पर हो। ट्रोलिंग वाले जमाने में थोड़ा प्रेम बांट ही दिया जाए तो क्या बुरा है? विदा सुलक्षणा, आप जैसे लोगों के लायक यह दुनिया नहीं। ईश्वर आपको सद्गति दें और हमसबों को थोड़ा सा बेहतर व्यक्ति बनने की प्रेरणा दें।
– अर्चना आनन्द भारती



