रात के साढ़े दस बजे थे। स्क्रीन की हल्की रोशनी कमरे की दीवारों पर पड़ रही थी, और हरीश धीरे-धीरे अपनी कुर्सी पर झुककर बैठा था। इनबॉक्स में एक पुराना-सा मेल खुला था—जिसमें एक नाम चमक रहा था—
“के देव…”
वो मुस्कुरा दिया
“के देव? ये क्या है?” उसने लिखा।
दूसरी तरफ़ वह भी मुस्कुरा रही थी।
उसने शरारत से लिखा, “नहीं बताऊँगी…”
“अच्छा, न-ना, प्लीज़ बता दो…” हरीश ने जैसे मान-मनौवल करते हुए कहा।
वह बोली,
“खुद ही जान लीजिये।”
कुछ पल का विराम था अब दोनो के बीच में
फिर उसने लिखा—
“कपिल देव!”
हरीश हँस पड़ा
“ओहो! समझ गया मैं…”
और इसी हंसी-ठिठोली के बीच रात की कहानी शुरू हो गई।
शाम ढली रोज की तरह.. फिर डिनर के बाद हुई शुरुआत.. दोनो तरफ से मीठी बात..
“ठीक है, रुकिए, मैं तीन मिनट में अपना खाना खत्म कर लूं,” हरीश ने लिखा।
“ओके,” वह तुरंत बोली, जैसे वाकई इंतजार कर रही हो।
कुछ ही देर बाद हरीश ने छोटा-सा संदेश भेजा—
“हे बेबी…”
इसके जवाब में उसने धीमी-सी “सी…” लिखा—शायद एक मुस्कान, शायद एक आहट।
स्पेनिश के इस शब्द सी का मतलब है हां
हरीश ने स्पेनिश में पूछा,
“कोमो एस्ता, ऊस्तेद?” — यानी, कैसी हैं आप?
वह खिलखिलाई,
“अच्छी हूँ।”
उसके हर शब्द में एक गर्माहट थी, जैसे दूरी को पिघला रही हो।
“रात कैसी बीती, प्रेयसी?” हरीश ने पूछा।
वह बोली, “अच्छी… लेकिन पूछो मत।”
हरीश ने उसे समझते हुए कहा,
“ठीक है, नहीं पूछेंगे। हमें पता है…”
“तो फिर पूछा क्यों?” उसने शरारत से उलाहना दिया।
हरीश ने धीरे से जवाब दिया—
“क्योंकि हमें आपसे सुनना अच्छा लगता है…”
और फिर जैसे उसके दिल के दरवाज़े खुल गए हों, वह लिखता चला गया—
“हमारा भी आज पूरा दिन नशे में बीता…
आपके शब्दों की गूंज हमारे कानों में बार-बार आती रही…
जब तक नींद नहीं आई…”
बदले में वो बस “ओह…” कह पाई।
कुछ घंटों बाद..
नींद बहुत अच्छी आई थी कल की रात – शोमी ने कहा
‘थककर नहीं, प्यार में डूबकर आने वाली नींद थी वो’
“हमें भी शायद आज… सालों बाद…बहुत अच्छी नींद आएगी,” हरीश ने लिखा।
“जिसे असली नींद कहते हैं—वही।”
वह मुस्कुरा उठी—
“ओए होए… के देव…”
हरीश ने छेड़ते हुए कहा,
“कहिए, मेरी आर देवी…”
वह हँसी।
“अरे, मैं कोई राबड़ी देवी नहीं हूँ!”
“कामदेव की रति देवी हो,” हरीश ने धीमे से लिखा—
औृर रात अचानक और गहरी, और अंतरंग हो गई।
फिर जैसे एक ऐसी रात आई जो उम्र भर चलने वाली थी ऐसा लगा
“नींद नहीं आती… बहुत लंबी रात है…” वह बोली।
और हरीश ने जवाब दिया—
“आपके साथ ज़िंदगी की बस एक रात ही काफी है…
जीने के लिए…जहाँ हर लम्हा… युगों-युगों जैसा।”
वह चौंक गई—हंसी और शर्म के बीच कहीं खो गई।
“सोच लो ठाकुर…” उसने लिखा।
“सोचना क्या है?” – हरीश ने पूछा नहीं बताया
“गब्बर के साथ एक रात?” जब ये शोमी ने कहा
तो हंसते हुए हरीश ने जोड़ दिया—
“और फिर उस रात की सुबह नहीं होगी!”
फिर हरीश ने लिखा—
“वह रात ज़िंदगी से भी लंबी होगी…
जिंदगी भर याद रहेगी…
लम्हा-लम्हा गुजरती…
सेज पर सजी रात…”
शोमी को लगा कि शायद अब वो भी अपने दिल सी पिघलने लगी थी—
“बहुत हुआ… अब…”
“के देव… भड़काओ मत।”
उसके शब्द गर्म थे, सांसों जैसे।
मगर हरीश ने शरारत जारी रखी—
“जब तक बुझती नहीं, भड़कती ही रहती है…
‘आर’ के बिना ‘के’ अधूरा है…
और इस मिलन के बाद ही प्रेम पूरा है…”
वह बस एक शब्द कह पाई— “ओहह..”
अचानक लगा जैसे कोई घंटी सी बजी..सोयी हुई शोमी ने नजर डाली बगल में रखे फोन पर..उसमे लाइट चमक रही थी -याने कोई मैसेज आया था .
नजर डाली तो देखा – ‘बहुत बहुत बहुत प्यार है तुमसे मेरी शोमी !’
ओह, इतनी रात को भी चैन नहीं हैरी को !
अगले दिन सुबह कोई मैसेज नहीं आया..दोपहर को फोन की लाइट चमकी -हरीश ने फोन देखा शोमी की मुस्कान दिखी –
साथ में लिखा था –
“तो, अधूरे मिस्टर KD… आप कब पूरे होंगे?” उसने पूछा।
“मत पूछिए…” हरीश ने लिखा,
“अब इस ज्वाला को मत भड़काइए… हमसे रहा नहीं जाता…”
“शोला जो भड़के—दिल मेरा धड़के?” – गाने लिख कर शरारत करने वाली शोमी हंसकर बोली।
“दिल भी… और दिलदार भी…” हरीश ने कहा।
कुछ घंटों का साइलेन्स सूरज की तरह ढल गया शाम को और फोन पर मैसेज की लाइट जल गई.
शोमी ने लिखा था कुछ – “कितना कम वक्त मिलता है आपसे बातें करने के लिए…”
हरीश को लगा जैसे वो अचानक उदास हो गई हो।
“जानता हूँ… लेकिन क्या करूँ? जाना पड़ता है, शोमी” उसने लिखा।
“अभी तो हम आए हैं ..औऱ अब आपको जाना है?”
हरीश का दिल भर आया।
“ओह शोमी…
ओह हैरी…”
उसके शब्द कंपकंपा रहे थे।
“बहुत तकलीफ होती है…पहले आपके आने की खुशी मिलती है…और फिर आपके जाने का दुख…”
पर वह मजबूर था।
“जानता हूँ… लेकिन क्या करूँ?”
शोमी ने इस रात का लगभग अंतिम वाक्य लिखा—
“ठीक है, माई लव…
”ओके ..दिन में मिलते हैं, शेमी”
“जी।” उसने कहा -“दिन आने तक… किसी तरह जी लेंगे, हैरी…”
उसके शब्द धीमे थे।
“ख़याल रखना अपना.. और हां, अब ज्यादा सोचना नहीं, सो जाना…” हैरी ने कहा।
“आप भी… डियर।”
और फिर रात वहीं स्थिर हो गई…दो दिलों के बीच..सड़क की दूरियों सी
टिमटिमाती हुई स्क्रीन की रोशनी धीरे धीर मंद पड़ गई
एक प्यारी सी, कभी न भूलने वाली इंतजार जैसी लंबी रात के साथ बिनबोले होती रही बात दो दिलों की
जिसे मोबाइल फोन की जरूरत न थी..
(सुमन पारिजात)



