Love Storiyan -3:– ये है जया और संजय की चैट डायरी..ये प्यार की कहानी है जो शुरू तो होती है पर खत्म नहीं होती..
कहते हैं कि किसी कहानी की शुरुआत अक्सर एक छोटे-से “हाय” से होती है। जया ने भी ऐसा ही किया — “हाय” लिखकर। और फिर सिलसिला चल पड़ा…
संजय की सुबहें अब गुड मॉर्निंग के साथ नहीं, बल्कि “गुड मॉर्निंग जया” के साथ होने लगीं। जया भी जवाब देतीं — “गुड ईवनिंग जी”। धीरे-धीरे ये “जी” उनके संवाद में मिठास का तड़का लगाने लगा।
खोज दिल्ली में की, पर मिली दिल में कोई वो जो हमेशा को मिल गई।
संजय ने एक दिन बड़ा ही फ़िल्मी अंदाज़ अपनाया। बोले —
“ना ना, ग़ायब नहीं, तुम ही दिखती नहीं। इंडिया गेट, क़ुतुब मीनार, लाल क़िला… कहीं नहीं दिखीं जया। सब जगह देखा पर अपना दिल नहीं देखा। वहाँ मिली तुम।”
जया हँस दीं — “हा हा हा”।
तन-मन से आत्मा तक का सफर है मोहब्बत का सफर।
जब जया ने पूछा — “कहाँ रहते हो?”
संजय का जवाब सीधा दिल को छू लेने वाला था —
“मैं तो अपनी जया के तन-मन में रहता हूँ… बाद में तुम्हारी आत्मा में रहूँगा।”
जया ने हँसते हुए कहा — “बहुत शरारती हो।”
संजय ने पलटकर छेड़ा — “मिलोगी तब देखना, शरारत तुम्हें पसंद आएगी।”
उसके बाद किताब का टाइटल बना इज़हार ए चाहत।
कभी-कभी चैटिंग ही कहानी का विषय बन जाती है।
एक शाम संजय ने अचानक लिखा — “कभी तो मिलोगी।”
जया ने झट से कहा — “वाह, ये टाइटल बहुत अच्छा है। इस पर बुक लिख सकते हो।”
संजय बोले — “हाँ जॉय, तुम्हारी स्टोरी लिखेंगे इस टॉपिक से।”
प्यार से जॉय कहना पसंद था संजय को अपनी जया के लिये। बदले में जया उसे सैन्जी कहती।
बिलकुल ये दोस्ती किसी फ़ेवीकोल के जोड़ से कम न थी।
लेकिन फिर आया हक़ीक़त का ट्विस्ट। जया ने एक दिन लिख दिया —
“मेरा और मेरे मिस्टर का फ़ेवीकोल का जोड़ है। जहाँ मैं, वहाँ वो हमेशा साथ। हॉस्पिटल जाना हो या मार्केट, हमेशा साथ। बस बाथरूम में ही अलग होते हैं।”
संजय ने लम्बी साँस लेकर लिखा — ओह हाँ, मुझे पता है तुम मैरीड हो जैसे कि मैं..मेरा तो तुमको पता ही है..पर हाँ, मेरा वाइफ के साथ फेवीकोल वाला जोड़ नही है। हमारी फ्रीस्टाइल जोड़ी है, घर में साथ घर के बाहर अपनी लाइफ.
क़ैद में दिल बुलबुल का भले ही बुलबुल हो आजाद।
एक दोपहर लिखा संजय ने कि मेरी बुलबुल हो तुम मेरे जीवन के आकाश में..कहीं भी रहो..मेरी हो तुम !
जया ने भी मान लिया कि उनका दिल तो सैन्जी के ही पास है। उसने लिखा —
“आपने बहुत क़ीमती दिल ले लिया है, एक ऐसे इन्सान का दिल जिसके साथ उसके बॉडीगार्ड रहते हैं। अब बताइए प्रेम कैसे कीजिएगा? आपका प्रेम तो क़ैद में है।”
संजय ने भी मान लिया — “हाँ यार, ये तो मुश्किल काम है। लेकिन मुझे कैद से क्या लेना-देना.. पिन्जरा किसी और का सही, बुलबुल तो मेरी है।”
तो ठीक है फिर, इस खयाल से ही काम चलाओ – हंसी वाली इमोजी के साथ आया जवाब जया का।
संजय के साथ अपने रिश्ते को लैला-मजनूँ वाला हाल बताना मजेदार लगा जया को।
जया ने गाना याद दिलाया —
“मैं लैला-लैला चिल्लाऊँगा कुर्ता फाड़ के…लगता है ऐसी हालत है तुम्हारी”
संजय के पास कहने को बस इतना ही था —
“हाँ यार, मिलना तो पड़ेगा..नहीं मिलोगी तो मेरा क्या होगा?”
यादों की परतें अक्सर बातों बातों में उभर आती हैं।
कभी गुड ईवनिंग, कभी गुड आफ्टरनून, तो कभी शायरी —
“कहाँ हो तुम, कि ये दिल बेक़रार आज भी है, किसी नज़र को तेरा इंतज़ार आज भी है।”
जया ने भी तंज़ कसा —
“ग़ायब तुम हो, पता नहीं किसकी ज़ुल्फ़ों की छाँव में सो रहे हो।”
संजय ने कसम खाते हुए लिखा —
“तुम्हारे अलावा कौन है? तुम्हारी ज़ुल्फ़ों की छाँव में ही सोना है। ज़ुल्फ़ें कटाना मत प्लीज़।”
और फिर…
कहानी अब भी वहीं ठहरी है — वादों, शरारतों और इंतज़ार के बीच।
संजय रोज़ गुड मॉर्निंग और गुड ईवनिंग भेजता हैं, और जया मुस्कुराती है, जानती है कोई तो है उसे प्यार करने वाला। प्यार तो वो भी करती है पर इस प्यार में मिलन नहीं क्योंकि दूरी बहुत है।
दोनों जानते हैं —और सोचते भी हैं -कभी तो मिलेंगे !
(सुमन पारिजात)



