Shobha Singh writes: जीवन में नित्य-प्रति आतेजाते मौसम उनकी खुशबू और उनके रंग दिल में उतर जाते हैं और फिर निखर कर आते हैं भावनाओं के प्रतिबिम्ब बन कर..पढ़िये शोभा सिंह की कलम से उकेरे गये शब्द-चित्रों को..
शाल्मली,पलाश ,नीम इनके रंग-बिरंगे फूलों के छींटे फागुन की आमद दर्ज कराते लग रहे हैं।धरती मदालसा बन रही है।अधपके बेरों की झूलती टहनियों को झुका देखकर अनुराग उमड़ता है ।इस देशज स्वाद और गमक से स्मृतियों की धारा प्रत्यावर्ती हो उठती है।
एक ओर वनवासियों का दुलारा महुआ पीले-पीले गुच्छों में अनावृत अपने सुरंग और सुगंध के साथ ऐसे झूलता है कि उसके रंग और गंध की मादकता में प्रकृति झूमती दिखाई देती है वही नारंगी फांकों में बिखरे रेशमी पत्रकों में सुरंग घोलकर पलाश अनूठी छटा और मधुरिमा से आवृत करता है।
गदराए अमरूदों के गुल्मों के आकर्षण में बंधते हुए,नीम के धवल पुष्पों,आम्रकुंजों में अरुणिम कोंपलों के संग नवीन पुष्पकों(मंजरियों) में फागुन अब भी खिलखिलाता हुआ मदमस्त डोलता है। भले ही उसकी खिलखिलाहट मेरी घरघुसरी जीवन चर्या में शामिल नहीं हो पा रही है।लौटते समय भुजयुग्मों से आबद्ध कर पलाश को एक गाढ आलिंगन दिया।
उस स्पर्श से उपजे मुखर मौन के कुछ पलों में हर्ष एवं विषाद सम पर लगे।उस समय कण्ठ में उठते राग को बस महसूस किया जा सकता था… व्यक्त नही..भव’ की ‘भूति’ का मौन मधु पार्थिव लेखनी में पूर्णांक समाकृत किस विध हो?हाथ में मोबाइल लिए कुछ तस्वीरों से रोक लेना चाहा उस क्षण को… लेकिन घर आकर इस विराट संजाली यंत्र पे टिके नेत्रों में पलाश और शाल्मली के फूलों की रंगत अंगार सी उमड़ रही है। सद्भावों के उद्रेक से भरे मौन आशीष मेघ मल्हार से झरने लगे हैं।
हम जिनसे कभी बहुत गहरा प्यार कर लेते हैं तो उसकी छाप आत्मा से पूरे जीवन नहीं जाती जैसे पारिजात के धवल अंतःकरण में बस जाता है जोगिया कुसुंभी रंग। ऐसा नहीं होता है कि तुम्हे याद करते हुए दिल सम पर धड़क सके वो हमेशा दुगुन में न भी हो तो ड्योढ़ा तो चलता ही है।रूबा बता रही थी सबसे कठिन है ड्योढ़ा गाना।दुगुन, तिगुण साधना सरल हैं लेकिन आधी मात्रा का बहुत टंटा है।
प्रेम में सब आफ़त इसी ढाई मात्रा की है कहकर हँसी थीं।वो कहता है शतरंज में भी सबसे ख़तरनाक घोड़े की चाल होती है कि उसे कोई रोक नहीं सकता अपने हिस्से के ढाई घर चलने से।इसी तरह प्रेम भी अपना रुतबा क़ाबिज़ कर जाता है। संगीत या शतरंज तो नही जानती मैं लेकिन मुझे भी लगता है यह प्रेम ही है तुमसे जिसके विरह में यह अनाम धुन आत्मा के तार सप्तक तक व्याप्त हो रही है ।शीतलता और दाहकता का समरसित राग।
स्मृतियों की हल्की आँच से पसीजी हथेली…उँगलियों से पेन की फिसलन..आँखों की कोर बार बार पोंछ रही हूँ…चिट्ठी तो लिखनी है भले ही न पोस्ट करूँ।
वैसे भी जिसने कभी पलाश की आग में पिघलते चिट्ठी न लिखी हो तो क्या ख़ाक उससे प्रेम किया !
(शोभा सिंह)



