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Tuesday, February 24, 2026

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Poetry by Saumya Dua: फिर कहता है चंचल मन – चल सपने बुन

Poetry by Saumya Dua: जीवन की समझ बढ़ती हुई उम्र के साथ और गहरी होती जाती है..अपनी ही किताब के अगले पन्ने पर क्या लिखा है, अक्सर उत्सुकता पैदा कर देता है..
उलझी गांठों
को
सुलझाते
सुलझाते
थक चुका
है मन..

कब तक

रह सकता है

ऊर्जावान इंसान

उम्र की कोई

सीमा नहीं

माना

ये ज्ञान

ज्ञानियों

द्वारा सुना

सुनाया..

आत्मा

चाहती है

बंजर ज़मीन

को उपजाऊ

बनाना..

आखिर कब

तक

संजोना है

धैर्य, साबुरी..

नहीं सुनाई

देती है

कोई मीठी

बांसुरी

की धुन..

चंचल मन

फिर उछाल

मार कहने

लगता है

चल

सपने बुन..

(सौम्या दुआ)

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