जब टूटता है तारा
मैं अपने नेत्र मूंद लेती हूं
एक ही प्रार्थना करती हूं
तुम्हारा मखमली एहसास
लिपटा रहे मुझमें
जब पलकें टूट के गिरती हैं
मैं गहरी सांस भर
याद करती हूं तुम्हारा चुम्बन
जब मंदिर की घंटी बजती है
मेरा मन भी थिरकता है हौले से
उस प्रतिध्वनि में
तुम्हारी पवित्र सांसे
मुझे छू कर कर देती हैं
एक अधखिला गुलाब
जब माताएं रखती हैं उपवास
मैं भी तोड़ देती हूं
एक दिन के लिए राब्ता
जब टूटता है व्रत
सामने होती हैं व्यंजनों से भरी थाली
मैं तुम्हारे गोद में आश्रय ले
प्रमाण देती हूं अपने संतुलन का।
(निवेदिता रश्मि)



