Poetry by Nirupama Shrivastav: सधे हुए हाथों की कलम ने खोले हैं किवाड़ भावनाओं के जिनसे होकर आप प्रवेश कर सकते हैं संवेदनाओं के घर में..
मैं उस घर में बहू बनकर आई थी,
तो घर पहले से ही पुराना था
पर उसका दरवाज़ा
अब भी नया-सा लगता था।
भारी लकड़ी,
पीतल के फूलदार कील-काँटे,
और हर कील में
कोई अनकही कहानी।
मैंने उस दरवाज़े को
अपने मायके के दरवाज़े की तरह
कभी परखा नहीं,
बस स्वीकार किया
जैसे ससुराल को
स्वीकार किया जाता है।
पति ने ही एक दिन बताया था
“यह दरवाज़ा परबाबा ने बनवाया था।
ख़ुद शहर से बढ़ई बुलवाया था।
कहते थे
घर टिके न टिके,
दरवाज़ा मज़बूत होना चाहिए।”
मैं चुपचाप सुनती रही।
परबाबा को मैंने देखा नहीं था,
पर उनकी मौजूदगी
उस दरवाज़े में बसती थी।
सुबह जब मैं पूजा के बाद
उसे हल्के से खोलती,
तो लगता
किसी बुज़ुर्ग का आशीर्वाद
मेरे माथे से फिसल गया हो।
सास बताती थीं
“इसी दरवाज़े से
तेरे ससुर मुझे ब्याह कर लें आए थे।”
और पति हँसते हुए जोड़ते
“इसी पर बैठकर
हम सबने बचपन में
कंचे खेले हैं।”
समय धीरे-धीरे
घर से ज़्यादा
लोगों को बूढ़ा करता चला गया।
सास की चाल धीमी हुई,
आँगन सूना पड़ गया।
मैंने कई बार
उस दरवाज़े की दरारों से
झांकते हुए सोचा
कितनी पीढ़ियों की
यादें सहेजता होगा किवाड़।
फिर एक दिन
घर गिरा बारिश में
माटी की दीवार
थक चुकी थीं,
उघड़ रही थी
बेहिसाब
खपरैल का घर
भरभरा कर गिरा
अंदेशा था सबको
पर शहरी फ्लैट वालों
को क्या पड़ी गिरे तो गिरे
जब घर ढहा,
तो मेरा मन सबसे पहले
उस दरवाज़े की ओर भागा।
वह वहीं पड़ा था
मिट्टी में दबा
घायल-सा,
पर अब भी पहचान वाला।
निकाला गया दरवाज़ा
दरक गया था
जैसे टूटा मन
पोते का मुंडन
माघ की ठंड
अलाव जला
किसी ने कहा
“इसे काटकर जला देते हैं।”
मैं कुछ बोल न सकी।
शायद बहू होने का
यही मौन था।
या दरवाज़े की जीर्णता
को स्वीकारता मन
शाम को
उसे चीर कर
अलाव में जलते देखा।
पीतल की कीलें
आग में चमकीं
जैसे परबाबा
एक आख़िरी बार
सबको देख रहे हों।
मेरी आँखें भर आईं।
मैं परबाबा को जानती नहीं थी,
पर उस पल
उनकी याद
मेरे भीतर जल रही थी।
मन भीग गया
आग के सामने भी।
कितने उछाह से
लगवाया होगा
इस किवाड़ को
बिलारी बंद करते
परदादी की चूड़ियों
की खनक,
ड्योढ़ी पर धरे
दिए की कालिख
मानों दरवाज़े का डिठौना
बहू की दुआर ड़काई
पर बेटियों की ठनगन
नन्हे- मुन्नों का
ड्योढ़ी से बकैया झांकना
सब कुछ सुलग कर
दहक रहा था हौले-हौले
अलाव के चारों ओर
गर्माहट दे रही थी
अपनी अंतिम सांसों से
सुकून
पर मेरा मन
सीली लकड़ी सा
धुंआ धुंआ
आज नया घर है,
नया दरवाज़ा भी।
पर जब भी
उसे बंद करती हूँ,
हाथ अपने आप
धीमा हो जाता है।
कहीं भीतर से
एक आवाज़ आती है
“ज़ोर से मत बंद करना…”
शायद यह दरवाज़े की नहीं,
परबाबा की सीख है,
जो बहू तक को
विरासत में मिल गई।।
(डॉ निरुपमा श्रीवास्तव)