Parveen Babi की कहानी 20 जनवरी 2005 को मुंबई में खत्म हो गई जब बड़ी ही खामोशी से उन्होंने दुनिया को अलविदा कह दिया..
साल था 1954। गुजरात के एक घर में एक नन्हीं बच्ची ने जन्म लिया — नाम रखा गया परवीन बाबी। किसे पता था कि यह बच्ची एक दिन भारतीय सिनेमा की सबसे चमकदार और सबसे चर्चित हीरोइनों में शुमार होगी।
उनकी आंखों में एक अजीब सा जादू था… होंठों पर मुस्कान, चाल में आत्मविश्वास, और अंदाज़ में बिंदासपन।
फिल्मी सफर की शुरुआत
साल 1973 में परवीन बाबी ने अपनी पहली फिल्म चैत्र की शूटिंग की। उनके हीरो थे मशहूर क्रिकेटर सलीम दुर्रानी। फिल्म बॉक्स ऑफिस पर भले ही चल न सकी, लेकिन इंडस्ट्री में सबने नोटिस किया कि यह लड़की अलग है।
दो साल बाद आई दीवार ने तो जैसे उनकी किस्मत का दरवाज़ा पूरी तरह खोल दिया। वह सिर्फ “हीरो की प्रेमिका” बनने नहीं आई थीं… वह खुद स्क्रीन की रानी थीं।
स्टाइल, ग्लैमर और बिंदास छवि
परवीन बाबी के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने बॉलीवुड में ग्लैमर का मतलब ही बदल दिया। वह सिगरेट पीतीं, शराब के गिलास के साथ पोज देतीं, बिकिनी पहनकर कैमरे के सामने खड़ी हो जातीं — और यह सब एक बिंदास मुस्कान के साथ।
वह सिर्फ एक हीरोइन नहीं, बल्कि उस दौर की ट्रेंडसेटर थीं। उनके कपड़े, हेयरस्टाइल, मेकअप — सब कुछ एक फैशन स्टेटमेंट बन जाता था।
दिल की दुनिया और रिश्ते
चमक-दमक के इस संसार में परवीन का दिल भी कई बार धड़का। वह चार साल तक अभिनेता डैनी डेन्जोंगपा के साथ रहीं। फिर उनकी जिंदगी में आए कबीर बेदी और बाद में निर्देशक महेश भट्ट।
लेकिन उनकी पर्सनल लाइफ कभी स्थिर नहीं रही। रिश्ते टूटते गए और वह और भी अकेली होती गईं।
बीमारी का साया
1980 के दशक की शुरुआत में उनकी जिंदगी पर एक काला साया छा गया। डॉक्टरों ने कहा — पैरानॉयड सिज़ोफ्रेनिया। यह बीमारी इंसान को अपने ही लोगों से डराने लगती है, शक पैदा करती है, और धीरे-धीरे आपको दुनिया से अलग कर देती है।
परवीन को लगने लगा कि कोई उन्हें नुकसान पहुंचाना चाहता है। उन्होंने फिल्मों से दूरी बना ली, दोस्तों से कट गईं और भारत छोड़कर अमेरिका चली गईं। वहां उन्होंने अपने आध्यात्मिक गुरु की शरण ली, लेकिन भीतर का अकेलापन और बीमारी उन्हें धीरे-धीरे खा रही थी।
अकेलेपन की खामोशी में मौत
20 जनवरी 2005… मुंबई
उनके पड़ोसी को तीन दिनों से उनके घर का दरवाज़ा बंद मिला, अंदर से कोई आहट नहीं। बदबू फैलने लगी थी। पुलिस आई, दरवाज़ा तोड़ा गया — और वहां परवीन बाबी अपने कमरे में निर्जीव पड़ी थीं।
पोस्टमार्टम ने बताया — उनके कई अंग खराब हो चुके थे। मौत तीन दिन पहले ही हो चुकी थी… और इस बीच उनका शव सड़ चुका था।
अंतिम इच्छा और विवाद
कहा जाता है, परवीन चाहती थीं कि उनका अंतिम संस्कार ईसाई रीति से हो। लेकिन उनके मुस्लिम रिश्तेदार आगे आए और उन्होंने उन्हें इस्लामी परंपरा से दफनाया।
यह अंत उस महिला का था जिसने करोड़ों लोगों को अपने अंदाज़, खूबसूरती और अदाकारी से मोह लिया था, लेकिन आखिरी समय में वह अपने ही घर में, दुनिया से कटी हुई, चुपचाप चली गईं।
(प्रस्तुति -अर्चना शेरी)



