पिता की आवाज़ अब भी उतनी ही बुलंद है
ढलती उम्र में भी
स्वर की तीव्रता वैसी ही है
मानो उनके भीतर
कोई समुंदर अब भी
गर्जना कर रहा हो
माँ, इसे जोर से बोलना कहती हैं
कि समय बदल गया है
चार लोग भला क्या कहेंगे?
कि चिल्लाते रहते हो
पिता ने ‘चार लोगों’ की कभी परवाह नहीं की
पिता अपनी इस तरह की आवाज़ को
अपने ठीक होने का प्रमाण बताते हैं
वरांडे से सटा कमरा उनका अपना है
वहीं उन्हें सुकून मिलता है
अपने कमरे में
वे किसी का हस्तक्षेप नहीं चाहते
पिता को यह कतई पसंद नहीं
उनके सजाए सामान को
कोई हाथ लगाए
उन्हें, अपने कमरे की महक अति प्रिय है
उन्हें अपने तखत पर ही
नींद पूरी आती है
कहीं और सोने से उनकी नींद कहीं और चली जाती है
वह बार-बार आवाज़ देकर
किसी न किसी को बुलाते रहते हैं
अनावश्यक बुलाने पर, बच्चों को खीज होती है
वह कहते हैं, बुलाते रहना चाहिए
जिससे यह एहसास बना रहता है
सब हमेशा आस-पास हैं
वह फिर कहते हैं
बुलाने से ही तो
बारिश उतरती है
सूरज निकलता है
चाँद खिड़की पर झुक आता है
फूल महकते हैं
पत्ते हिलते हैं
किसी के उनके पास आने से पहले
उसका ‘हाँ’ पहुँचना ज़रूरी है
बिना हाँ सुने वह किसी का आया नहीं मानते हैं
कहते हैं एक सेकंड में प्राण भी निकल जाता है
कि मृत्यु से डर नहीं लगता
कि डर घिसट-घिसट कर जीने में लगता है
पिताजी पहले सख़्त थे
अब बहुत कोमल
पर उनकी सख़्ती का रूआब
आज भी सबके दिलों में पसरा है
हम उनसे
“हाँ जी” से आगे
कुछ कह ही नहीं पाते
इस उम्र में
कोई हमेशा पास होना चाहिए
जब वे अकेले रह जाते हैं
तो उनका कठोर दिल
पिघलकर दरिया तब्दील हुआ जाता है