Poetry by Anju Dokania: सर्वाधिक प्रिय उपहार हो तुम !
Poetry by Anju Dokania: प्रेम के शब्द वो रंग होते हैं जो लगाने वाले के दिल में होते हैं और जिस चेहरे पर लगाये गये होते हैं उसकी मुस्कान में खिलते हैं..अंजू की कलम के रंग आज फिर हैं आपके संग..
सर्वाधिक प्रिय उपहार हो तुम !
मुझे सर्वाधिक प्रिय
एक उपहार
मेरे जीवन में
जो तुमने दिया कान्हा
अनमोल है मेरे लिये !
वो एक साथ जहां
सब साझा करती हूं
निर्भय हो कर
वो जो है
मेरी हर बात का राजदार
वो जो है
मेरी भावनाओं का आधार
वो जो सिखाता है
बहुत कुछ मुझे
क्या नाम दूं
अपने उस प्रिय शिक्षक को
विभिन्न भूमिकाएं
मेरे जीवन में निभाने वाले
उस व्यक्तित्व के साथ
कैसे करूं न्याय
कौन सी उपमा दूं
क्या कहूं उसे
वो ही तो है वो
जिसके साथ
कोई हिचकिचाहट नहीं होती
जब भी कुछ बताती हूँ
क्यूंकि वो है मेरा विश्वास
वैसी ही शांति और निश्चिंतता
का अनुभव करती हूँ
उससे बात करने के बाद
जैसा अनुभव होता है
माँ से और कान्हा जी से
बात करने के बाद
प्रियतम मेरे
आप मेरे अंग-संग हैं
उस अदृश्य परमेश्वर की भांति
जो दिखता नहीं
पर होता हैं आसपास मेरे
जो भीतर है मेरे
जो मुझे कभी
अलग नहीं होने देता
अपनेआपसे
और जो मुझमें
जागता रहता है
विश्वास बन कर
इस संदेश के साथ
कि बढ़ो आगे
गतिमान रहना ही जीवन है
जो कहता है मुझे
कि कर सकती हूँ
सब कुछ मैं
क्यूँकि मुझ पर है
पूरा विश्वास है उनको
फिर मैं बिना डरे
कर जाती हूँ वो सब कुछ
जो नहीं लगती मुझे.
मेरे बस की बात
हो सकता है पढ़ते हुए
लगे आपको मेरी बात
कुछ किताबी सी
पर मेरी भावनायें
हैं वो किताब
जिसका प्रत्येक अक्षर
होना चाहता है
समर्पित आपको
अपने ईश्वर का
स्मरण प्रत्येक सुबह करती हूं
उसके बाद स्मरण उसका
जिससे आत्मा का जुड़ाव है
वहीं बसे हैं
आप मुझमें
विलग नहीं हैं
आप मुझसे !
सच ये भी है
कभी-कभी आप जब
उत्तर नहीं देते मेरी बातों का
मैं सोचती रह जाती हूं
कि सुन रहे हैं न आप
मेरी बात
समझ रहे हैं न
मेरी भावनाओं को आप
और है न हमेशा की तरह
मेरे साथ !!
(अंजू डोकानिया)
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