प्रिय,
नहीं जानती मैं
लिखते हुए यह पत्र
कि तुम्हें संबोधित करने का अधिकार
है या नहीं मेरे पास
न कोई वादा रहा
हमारे बीच
न कोई स्पष्ट संवाद
फिर भी नाम तुम्हारा
भीतर मेरे अंकित है ऐसे
जैसे अनजाने में लिखी गई कोई पंक्ति
किसी प्राचीन ग्रंथ के हाशिये पर
जो मुख्य कथा से अलग होकर भी
स्मृति में रह जाती है
सबसे अधिक
कुछ मिला नहीं तुमसे
फिर भी बदल गई हूँ मैं
कोई स्पर्श नहीं दिया तुमने
आश्वासन भी नहीं
फिर भी पिघल गई हूँ मैं
अपने भीतर से
अजब अनुभूति है यह
जिसमें पाने का सुख नहीं
और खोने का भी अधिकार नहीं
लगता है कभी कभी
यदि पास होते सच में तुम
तो पवित्र न रहता शायद
यह भाव इतना
यह जो मौन है
कदाचित इस प्रेम का
सबसे सुरक्षित रूप है
जहाँ अपेक्षा नहीं है
इसलिए पीड़ा भी नहीं है
मैं तुमसे कुछ चाहती नहीं
न समय तुम्हारा
न कोई उत्तर
इतना जान लो बस
कि इस संसार में
किसी एक हृदय ने
छुए बिना तुमको
महसूस किया है
बहुत गहराई से
कभी लगे तुमको
कि अनजानी शांति कोई
आसपास ठहर गई है तुम्हारे
समझ लेना तब
वह धन्यवाद है
मेरे मौन का
– बस तुम्हारी,
जो कभी थी नहीं
पर भीतर कहीं हमेशा रही
(अंजू डोकानिया)