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Monday, February 9, 2026

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Poetry by Anita Singh: वजूद को मिटा कर औरतें रोज बुनती हैं सपने

Poetry by Anita Singh: औरतों की दुनिया की बारीक समझ किसी खास कलम को होती है..जो लमहा लमहा जीती है और सदियों सदियों रोती है..वो अक्सर औरत होती है..

औरते अपने वजूद को मिटाकर
रोज बुनती है हकीकत से परे
कुछ सपने अपने इर्दगिर्द
जीती हैं एक आस लिए
कभी तो पूरे होगे
मन की अलमारी में
बंद पड़े हुए सपने
कभी तो खुलेगी वो खिड़की
जहां से कभी झांका करते थे
नित रोज नए नए सपने
उम्र के पड़ाव पर आकर
बस सोचती रह जाती है
कहां गए वो सपने
जो बुने थे लड़कपन में
फिर खुश हो लेती है
बच्चों के पूरे होते सपनों में
बेल की तरह लहराते बच्चे
जब गोदी में सिर रखकर
बोलते हैं मां तू कितनी
अच्छी है भोली है तू
तुझमें ही तो जीवन है
ढूंढ लेती हैं मुट्ठी भर सुकून
जिसकी तलाश करती औरतें
जीवन को होम करती हैं।

(अनीता सिंह)

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