Nandita Mishra writes: विरोध की दिशा और दशा दोनो समझनी होगी..समझदारी से इस संवेदनशील विषय के समाधान की तरफ बढ़ना होगा..
किसी ने कहा मैं महिला हूं और ब्राह्मण हूं फिर भी UGC की विरोधी क्यूँ नहीं?
इसलिए क्यूंकि मैं momentary reaction नहीं देती. सोचती हूँ, समझती हूँ फिर रिएक्शन देती हूँ.
अंधभक्त नहीं हूँ, मोदी की supporter जरूर हूँ पर मेरे कंधो पर सोचने समझने वाला दिमाग भी है
UGC Guidelines पर सवाल उठाना लोकतंत्र का अधिकार है,
लेकिन उसी मुद्दे पर “Modi सरकार बदलो” तक पहुँचना—यह अतिरंजित प्रतिक्रिया है।
सबसे पहले तथ्य समझिए।
UGC कोई राजनीतिक दल नहीं, बल्कि एक statutory body है।
Guidelines policy होती हैं—सरकार नहीं।
Policy में अगर अस्पष्टता हो, तो लोकतंत्र में उसका रास्ता होता है
discussion, correction और judicial review।
और यही भारत में हुआ।
Supreme Court ने UGC regulations पर stay लगाया।
सरकार ने उसका सम्मान किया।
कोई ज़बरदस्ती नहीं, कोई तानाशाही नहीं।
यह लोकतंत्र की मज़बूती है, कमज़ोरी नहीं।
मैंने UGC Bill पर तुरंत प्रतिक्रिया नहीं दी।
क्योंकि मैंने इस सरकार का तरीका देखा है।
Modi सरकार present reaction नहीं, permanent solution पर काम करती है।
इसी का उदाहरण है VBSA Bill 2025।
VBSA 2025 का मकसद साफ़ है—
विश्वविद्यालयों में
• भर्ती प्रक्रिया को transparent बनाना
• backdoor appointments रोकना
• ad-hoc और मनमानी culture खत्म करना
यह कोई headline-friendly bill नहीं,
बल्कि system-level सुधार है।
जो छात्रों, योग्य शिक्षकों और संस्थानों—तीनों के हित में है।
लेकिन जैसे UGC guidelines पर हुआ,
वैसे ही VBSA पर भी
पूरा context समझे बिना
भावनात्मक और राजनीतिक हंगामा खड़ा किया गया।
आज असली सवाल यह नहीं है कि
UGC guideline या VBSA में सुधार की गुंजाइश है या नहीं—
सुधार हमेशा संभव है।
असली सवाल यह है:
क्या हर policy disagreement पर सरकार बदलने की माँग सही है?
और उससे भी बड़ा सवाल—
जो लोग Modi को replace करने तक की बात करने लगे,
क्या वे सच में education reforms चाहते थे,
या फिर वही पुराने दौर वापस लाना चाहते थे
जहाँ campuses राजनीति के अखाड़े थे,
appointments में पारदर्शिता नहीं थी,
और accountability नाम की कोई चीज़ नहीं थी?
लोकतंत्र में असहमति ज़रूरी है।
लेकिन असहमति और अराजकता में फर्क होता है।
UGC guidelines पर बहस हो सकती है।
VBSA Bill 2025 पर सुझाव दिए जा सकते हैं।
संशोधन हो सकता है।
लेकिन उसी बहाने
देश की चुनी हुई सरकार को कमजोर करने की सोच
ना constructive है,
ना ही राष्ट्रहित में।
सवाल उठाइए—
लेकिन समाधान के लिए,
सरकार बदलने के शोर के लिए नहीं।
(नंदिता मिश्रा)



