Meenakshi Panchal writes: जीवन के कैनवास पर कलम चलाई है मीनाक्षी पांचाल ने..अनुभूतियों के साथ अठखेलियां करता जीवन का यथार्थ अवर्णनीय है..
छुप गई धुंध में, ख्वाइशों की रश्मियां जो कुछ पलों के लिए ओझल हो सकतीं हैं।
सघन बादलों की काली छाया भी बहुत देर तक उन्हें छुपा नहीं सकतीं। यह तो मनों का कुहासा ही है। कुछ पहर ठहरेगा। एक आध महीने से फैला है।यह धुआं आते हुई हवाओं के झोंके से उड़कर कब दूर निकल जाएगा।समझ ही नहीं सकेंगे। आज धुआं धुआ हुआ है। जिसने फैलकर से ढंक लिया है हर भाग को।अपरिचित हो गए मन के हर कोने ।
हवाएं लहरातीं हुई आएंगी। धक्का देकर खोल देंगी बंद खिड़कियों को।हो सकता है झटके से पल्लों का कांच भी टूट गिरे। यह आवाजों की आवाजाही में बाधा रहा
है।
लेकिन खिड़कियां अवश्य खुलेंगी। फिर आएगा बसंत।जिसकी सरसराहट झरोखों से पहुंचेगी तोड़ने उदासी को। सलवटों की दरारों में कुछ समाए शंकु विचार पनपे थे। शाखाओं के पोर से जन्मेंगे शिशु अंकूर।जो खेलेंगे किरणों की गोद में। जिसमें तितलियां रेशमी खोल फाड़कर निकलेंगी। उनसे अपने परों को बुनकर लगाएगीं अपनी पीठ पर। कुसुम रंगों को हथेलियों में सजाकर आने वाली तितलियों के पंखों पर भरने को उतावले होंगे।
सोने की आभा में रंगकर सुनहरी हो जाएगी नगरी ।वह सब वस्तुएं जो मटमैली हो चली थीं।
भंवरे सोने के सिंहासन पर फिर से बैठेंगे। उन्मुक्त होगी पवन। जिससे हृदय की किताब के पन्ने फड़फड़ाएगें।सरगम गाएंगी सांसें। सुकुमारी आंखें फिर बांधेगी डोरे एक छोर से दूसरे छोर पर इंद्रधनुष को थामने को।
(मीनाक्षी पांचाल)



