Medha Jha writes: चाहे वह बेटा हो या बेटी, हर संतान को अपने माता पिता की सेवा करनी चाहिए..ये सेवा बदले में आपको आपके जीवन में और आपके परिवार में सुख प्रदान करेगी..
अगर बहू या दामाद कुछ करते हैं तो ये स्वैच्छिक हो सकता है, किसी को दबाव नहीं दिया जा सकता। वैसे भी जो भावना अपने संतान में होगी वो दूसरे में हो ही नहीं सकती। मैने श्रवण कुमार की कहानी पढ़ी है, लेकिन उस कहानी का वास्तविक चित्रण अपने घर में देखा।
चतरा कॉलेज के प्राचार्य मेरे काका ने दादी की सेवा के लिए महीनों कॉलेज से छुट्टी ली थी। अभी भी वैसे ही आंखों के सामने है – अपने हाथ से सूप बनाते, बहुत स्नेह से दादी का एक-एक कार्य करते मेरे बड़े काका। पूरे गांव में सबका खूब ध्यान रखने वाली दादी कैंसर की मरीज थीं। जिस तरीके से बाल्यकाल में माता अपने शिशु का ध्यान रखती है, मातृवत स्वभाव वाले काका उसी तरीके से उनके हर चीज का ध्यान रखते थे। दादी के जाने के समय मैं काफी छोटी थी, लेकिन बाबा का हमें लंबा साहचर्य मिला।
मुझे याद है काका बाबा को अपने पास चतरा ले गए थे यह बोल कर – “अब तो मैं रिटायर हो गया हूँ तो आपके साथ 24 घंटे रहने का मुझे सुअवसर मिलेगा।” काका ने अपना बिस्तर बाबा के कमरे में ही लगाया था। और फिर वही दादी के अंतिम दिनों वाली उनकी दिनचर्या थी, सुबह से रात तक बाबा के साथ होना, उनके हरेक चीज का स्वयं ध्यान रखना, उनसे बातें करना।
घर में काकी, भैया, भाभी, बच्चे थे। लेकिन अपने माता-पिता की सेवा का मुख्य दायित्व उन्होंने सदा खुद निभाया, साथ में अन्य लोग सहयोगी भूमिका में ही थे। याद नहीं आता, काका ने कभी किसी को कुछ निर्देश दिया हो।
ईश्वर कृपा से हमारे दीर्घायु बाबा अंतिम समय तक पूर्णतः स्वस्थ थे, लेकिन उम्र की वजह से थोड़ी बहुत समस्याएं थी ही। भाभी ने बताया था कि एक दिन काका खाना खाने बैठे, तभी बाबा की कमजोर सी आवाज आई – “शंभू।” बाथरूम के लिए बिस्तर से उठे बाबा, शायद पहुंच नहीं पाए थे। तत्क्षण हाथ धो दौड़े काका, और बाबा की सहायता कर, उन्हें पुनः स्वच्छ वस्त्र पहना कर हाथ धो कर उसी सहज भाव से खाना खाने लगे।
भाभी बताई कि दूसरे बरामदे से खड़ी वो यह दृश्य देख रही थीं। जैसे बचपन में माता-पिता के समक्ष बच्चे को कोई लज्जा नहीं होती, वही अवस्था वृद्धावस्था में माता-पिता की होती है और उस स्थिति में अपने संतान से अधिक सहजता अन्य किसी के साथ नहीं होती।
बाबा के जाने के अगले वर्ष काका भी चले गए। वह योगी शायद माता-पिता को मोक्ष दिलाने ही मानव रूप धारण करके आए थे। ईश्वर से निरंतर प्रार्थना है उनके जैसी बन पाऊं और वही संस्कार घर के सभी बच्चों को मिले। (चित्र में बड़े काका-काकी और मेरा प्यारा भतीजा)
(मेधा झा)



