अनिका अभी ऑनलाइन है। पढ़कर आरुष ने एक मुस्कान का इमोजी भेज दिया।
अनिका का कोई जवाब न पाकर आरुष को लगा कि अब इमोशनल हो जाने का समय है।
उसने एक ग़ज़ल का लिंक भेजा –
वो जो हम में तुम में करार था | ग़ुलाम अली | ऑडियो सिंगल | पुरानी ग़ज़ल | उदास ग़ज़ल
फिर खामोशी के बाद पर्दा गिर गया. दोनो अभिनेता दर्शक अपने अपने घरों को निकल लिये
एक दिन बाद. फालतू टाइम मिला तो आरुष ने भेजा एक यूट्यूब लिंक –
लता मंगेशकर की आवाज़ में सुनिए खूबसूरत गाना – नैनों में बदरा छाए
जवाब नहीं आया. जवाब का इन्तजार भी किसे था.
फिर एक दिन बाद अनिका की नींद खुली. उसका मैसेज आया –
अनिका – सुप्रभात
कुछ देर नहीं कुछ घंटों के बाद आरुष की भी सुबह हो गई.
आरुष – जी सुप्रभात
कुछ देर बाद अनिका को लगा कि उसे भी कभी कभी इमोशनल होना चाहिये. उसने भी एक गीत भेजा जो गीत कम डॉयलाग ज्यादा लग रहा था –
अनिका – कभी तन्हाइयों में यूँ हमारी याद आएगी
तीन घंटे बाद आरुष को जब पता चला फिलहाल उसके पास फोकट टाइम है तो उसने भी लिख भेजा जवाब –
आरुष – आती है
अगले दिन अनिका ने सुबह सुबह दरवाजा नॉक कर दिया फेसबुक पर –
अनिका – सुप्रभात
कौन खोलता दरवाजा, खोलने वाला खर्राटे ले रहा था. आरुष ने दोपहर में लिखा –
आरुष – शुभ अपराह्न
दो घंटे बाद अनिका पधारी – केम छे?
चार घंटे बाद आरुष ने लिखा – प्रेम छे
अनिका ने फटाफट जवाब में सवाल पूछ लिया – चालू छे?
आरुष – नहीं, भालू छे !
अनिका – तू कैसा है रे? मेरे को याद ही नहीं करता
आरुष – रट गई हो तुम..पहाड़ी नहीं..पहाड़ा हो तुम !
एक दिन तक दोनो सोते रहे..तीसरे दिन अनिका ने लिखा – सरदार जी.. कित्थे हो तुस्सी?
जवाब नदारद था.
अनिका सचमुच इमोशनल फील करने लगी
उसने पूरी एक पोएम भेज दी –
मैंने तुम्हें आज बहुत चुपचाप याद किया…
इतनी चुपचाप कि जैसे कोई सांस ले रहा हो बिना आवाज़ के,
जैसे कोई साज़ हो पर सुर न निकले।
ना कोई आँसू बहा, ना किसी से कुछ कहा,
ना चेहरे पर कोई शिकन आई… सब कुछ एकदम सामान्य था,
पर भीतर बहुत कुछ हलचल कर रहा था।
सड़क पर चलते हुए भी तुम याद आए…
ट्रैफिक की आवाज़ों और भीड़ के बीच भी मन तुम्हारे आसपास ही भटका।
धूप की तपिश में भी, अंधेरे की खामोशी में भी,
और हल्की-सी बारिश की हर बूँद जैसे तुम्हारा नाम लेकर गिर रही थी।
पर दिल के भीतर… एक तूफ़ान चल रहा था।
हर धड़कन में एक पुकार थी, हर सांस में एक सिसकी छुपी थी।
हाँ, मैंने तुम्हें आज बहुत चुपचाप याद किया,
पर उस खामोशी की गूंज सीधे दिल से टकरा रही थी।
आरुष ने आधे घंटे बाद ही पढ ली पोएट्री – ओहो !
बस और कुछ नहीं लिखा उसने. यूं खामोश रह जाना उसका अक्सर अचंभित कर देता है अनिका को.
फिर पांच घंटे बाद कविता पर रिएक्शन दिया अंगूठे वाला आरुष ने.
अनिका – ये इतना बड़ा अंगूठा किसे दिखाया?
आरुष – आपके दिल का दरवाज़ा अब नई तकनीक से अंगूठा लगाकर खुलता है.
अनिका – ओहो !
अगले दिन फिर याद आई आरुष की अनिका को.
अनिका – सरदार जी, कैसे हो?
कोई जवाब नहीं आया काफी देर तक. तब अनिका को लगा रूठ जाऊं – देख कर भी अनदेखा??
जवाब फिर भी कोई नहीं आया अगले दो घंटों तक.
अनिका – क्या दिन आ गये हैं
अगले दिन अनिका ने सुबह सुबह ही राम राम कर ली आरुष से.
अनिका – जय राम जी की
फिर उसने आगे लिखा– आप तो ऐसे ग़ायब हुए जैसे कि…
आरुष शायद शायराना मूड में था. उसने हाईकू टाइप कविता लिख दी – ईश कृपा से..शीश बचा है..दिल तो तुमको दे ही दिया !
अनिका – आपके पास मेरी हर पहेली का जवाब होता है.
अनिका ने फिर लिखा – सुनो मैं सोच रही हूं काफी दिनो से..
कोई जवाब नहीं आया. तब अनिका ने आगे लिखा –
मुझे पास्ट रिग्रेशन में जाकर देखना है कि आप पिछले जन्म में मेरे क्या थे?
आरुष – हम आपके थे..मौन..जैसे सोनिया के थे मन-मौन
अनिका – मौन कैसे?
आरुष – आप हमारी आवाज़
हम आपका मौन
आप हमारे मस्तिष्क में
हम आपके हृदय में
अनिका कुछ न समझ पाई..और उसने कोशिश भी नहीं की. रजाई खेंच कर सो गई.
सुबह दिन निकला आरुष का तो अनिका का मैसेज पढ़ा –
अनिका – मेरे मौनी बाबा किधर हो?
पौरुष जी को नमस्कार..आहा पाले पाले
आरुष – गुड मॉर्निंग डार्लिंग जी
अनिका – थैंक्यू जी
आरुष ने मुसकान का इमोजी भेजा – अच्छा जी डार्लिंग सुन कर खुश हो गई
एक शायरी लिख दी उसने अपनी –
मुस्कुराना, एक लम्हे को मुझे जो याद करके तुम
तुम्हारे होंठों पर मेरी खुशी क़ुर्बान जाएगी!!
अनिका – ओह्ह…
अनिका ने फिर लिखा– मिस यू !
आरुष – मुस्कुराओ जो कभी मुझे याद करके तुम,
ख़ुशी मेरी तेरे होंठों पे क़ुर्बान जाएगी!!
इस बार अपना शेर सुधार कर लिख दिया था उसने.
आरुष की रात अनिका का संदेश पढ़े बिना बीत गई. दिन निकला अनिका के संदेश के साथ –
अनिका – सुप्रभात जी
अनिका ने आगे लिखा – तुमको याद क्यों न करें।
आख़िर मुस्कुराना भी तो ज़रूरी है।
शायद ये आरुष के शेर का जवाब था. कोशिश की थी अनिका ने..पता था कि शायरी लिखना उसके बस की बात नहीं.
आरुष – शुभ प्रभात
आरुष ने हंसता हुआ चेहरा भेजा – अब ये न कहना कि..एक बार मिल तो लें
अनिका – कौन ? किस से?
आरुष – बाबा बंगाली से
पत्थर पे मारेगा..तो पत्थर टूट जाएगा !
ये दावा है बाबा बंगाली का
अनिका – पत्थर पर मारने वाला आपको ही मुबारक
फिर शरमाने का इमोजी भेज कर अनिका ने आगे लिखा–
आप ये न सोचें कि हमें उसकी याद आती है
आरुष – न न, हमें आती है
अनिका – आपको तो आती ही होगी, हो ना ठरकी बंगाली बाबा
आरुष – ओ माय गॉड, आप तो सब जानती हैं
अनिका – सब जानती हूँ बंगाली बाबा को
कब, कहाँ, कैसे… कोई और जाने न जाने
लेकिन मुझे याद आता है प्यारा-सा, मासूम-सा…
जिसकी मुस्कुराहट से मेरा दिल डोलता था
आरुष – ओहो
बस इतना लिख कर बत्ती बंद कर दी आरुष ने. सुबह मैसेज मिला –
-पौरुष जी कैसे हैं
फिर कुछ देर बाद अनिका ने लिखा – किधर मस्त हो बाबा जी?
आरुष – आपकी यादों के मौसम में खोया हुआ हूँ
अनिका – खोया बनाया हुआ है
सफ़ेद, मुलायम, मीठा-मीठा
आप खोए से संदेश न बन जाना
पोलर बियर तो पहले ही से थे
आरुष – ओहो..बहुत याद है आपको
अनिका – पोलू नाम तो याद होगा
आरुष – ओह ..हाँ.. मुझे हमेशा अपना पोल याद आ जाता था
अनिका – आप हो ही ऐसे… पोल डांसर
आरुष – क्या करूँ..बाबा बंगाली को दिखाया था
अनिका – अच्छा?
आरुष – उन्होंने बोला कुछ नहीं हो सकता तुम्हारा
और ये भी बोला कि सबको मत दिखाया करो
कुम्हला जाएगा !
अनिका – उनको कैसे पता लगा कि आरुष सबको दिखाता है?
आरुष – मैंने बताया कि राहत नहीं मिली कहीं
तो उन्होंने बोला पुरानी पकड़ो…
अहमदाबाद वाली
अनिका – बोला नहीं कि अहमदाबाद वाली अब पकड़ में नहीं आने वाली?
आरुष – नहीं, उन्होंने बोला कि पकड़ने की क्या ज़रूरत है..मोटे हो जाने से कुछ नहीं बदलता
अनिका – अच्छा, वो बाबा तो बेशर्म है
आरुष – हाँ
अनिका – बेशर्मी ही सिखाएगा
आरुष – मैंने डाँट लगा दी उसको
मैंने बोला कि परवीन बॉबी अब…परवीन दादी बन गई है
कुछ तो शर्म करो!
अनिका – पोलू, तू नहीं सुधरेगा
भगवान करे तुझे कोई न सुधारे
ऐसा ही बना रह
आरुष – हाँ, थैंक्यू
ऐसी दुआ देते रहना
इस जनम में बिंदास जीने का
बाकी अगले जनम में देखना
अगले जनम में सुधर जाऊँगा
अनिका – तू न सुधरने का
आरुष – न न
अनिका – ऐसा ही रहेगा अगले जनम में
आरुष – एक जनम काफ़ी होता है सुधर जाने को
अनिका – मुझे तंग करने के लिए
आरुष – अगले जनम में कहाँ मिलेगी एना?
अगले जनम में मिलेगी मैना
अनिका – तेरी तो मैना, नैना, रैना… कितनी हैं!
सब मिलेंगी
आरुष – नैना.. रैना कोई भी चलेगी
एना छोड़कर सब चलेंगी
अनिका – अच्छा?
आरुष – हाँ
जो प्यार करे और इकरार से डरे,
उसका क्या करूँ?
इसलिए अब यादों से काम चला लेता हूँ
अनिका – मतलब?
आरुष – दो मिनट लगते हैं, बस
फिर याद नहीं आती हफ़्ते भर
अनिका – शैतान !
(प्रस्तुति -सुमन पारिजात)



