Love: बहुत गहन है यह भाव कर्म की भाँति ..मस्तिष्क में समझना और जीवन में बरतना सरल नहीं..प्रेम संभव है सरल हो कर..बस सरल हो कर !
प्रेम के लिए अपराधबोध उचित नहीं
हृदय से उपजता है प्रेम
अपने शुद्ध रूप में हृदय
देवालय है शिवालय है
विराजता है परमात्मा का आत्मा-रूप वहां
ह्रदय का ही सन्देश है प्रेम
और ह्रदय की ही विशेषता व विशेषाधिकार है
बहुत गहन है ये प्रेम
इसके कारण की खोज न करो
इसके आनंद में डूब जाओ
एक उपलब्धि है जीवन की प्रेम
ये सबकी पहुँच में नहीं होती
क्योंकि एक मानवीय हृदय की आवश्यकता होती है
प्रेम करने के लिये
एक चिरन्तन आनंद व सौन्दर्य को सहेज कर
जीने की क्षमता वाला हृदय ही है
सच्चा मानवीय हृदय
और प्रेम इसका सहज पुरस्कार है
वह वैभव-प्रासाद है यह
जिसके कपाट निर्धनतम के लिए भी खुले हैं
मिलती जुलती है ईश्वर की परिभाषा से
प्रेम की परिभाषा
शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता इसे
भाषा की परिधि से परे है यह
भाव जगत की अमूल्य निधि है
प्रेम की भावना
जो मानव को देवत्व की दिशा में प्रेरित करती है
इसलिये प्रेम को योग भी कहा जा सकता है
सर्वोत्तम और सर्वसुलभ मानव योग है – प्रेमयोग
अतएव करो प्रेम को स्वीकार
यह जीवन सत्य करो अंगीकार
प्रेम के साथ जियो
और प्रेम के लिये जियो
इस विश्व की और इस मानवता की
रक्षा यदि कोई कर सकता है
तो वह प्रेम है
प्रेम को भाव जगत से जीवन जगत में उतार कर
जीवन को स्वर्गिक सौन्दर्य प्रदान करना ही
वास्तविक लक्ष्य है जीवन का
जो दुर्गम दुष्कर कदापि नहीं
बस अपने हृदय को संपूर्णता प्रदान करो
वैश्विक संवेदना को
अपनी धड़कनों में स्थान दो
और सनातन धर्म के सनातन संस्कार
उतारो व्यवहार में
जीवन को जीवमात्र के प्रति प्रेम हेतु
कर दो समर्पित
तुम से बड़ा प्रेमयोगी कोई नहीं होगा !!
त्वदीयमस्तु गोविन्द तुभ्यमेव समर्पय !!!
(सुमन पारिजात)



