Chandrapur: महाराष्ट्र के इस टाइगर कॉरिडोर में बच्चों की पढ़ाई की चल रही है जंग – चंद्रपुर में चार साहसी महिलाएं बनीं स्कूल जाते बच्चों की मानव ढाल, दिन-रात निभा रहीं सुरक्षा की जिम्मेदारी..
ये है महाराष्ट्र का चंद्रपुर ज़िला जहाँ के घने वन क्षेत्र में बसा है एक छोटा सा गाँव। इस गाँव में, जहां हर पल बाघों का ख़तरा मंडराता रहता है, वहां चार ग्रामीण महिलाओं ने बच्चों की शिक्षा को बचाने के लिए असाधारण साहस का परिचय दिया है। ये महिलाएं न सिर्फ दिन में, बल्कि रात के घोर अंधेरे में भी हाथों में लाठी और टॉर्च लेकर बच्चों को सुरक्षित स्कूल आने-जाने में मदद कर रही हैं।
यह कहानी है चंद्रपुर के मोहोर्ली वन क्षेत्र में स्थित सीतारामपेठ गांव की, जो ताडोबा-अंधारी टाइगर रिज़र्व के अंतर्गत आता है। गांव चारों ओर से घने जंगल से घिरा है, जहां बाघों की लगातार आवाजाही बनी रहती है। गांव के चारों ओर भले ही तार की बाड़ लगाई गई हो, लेकिन लोगों का डर कम नहीं हुआ है। हालात ऐसे हैं कि जंगल के जानवर खुले में घूमते हैं, जबकि गांव के लोग खुद को एक अदृश्य कैद में महसूस करते हैं।
400 मीटर का रास्ता, लेकिन जान पर भारी
गांव से बस स्टैंड की दूरी महज 400 मीटर है, मगर यह छोटा सा रास्ता भी किसी खतरनाक सफ़र से कम नहीं। एक ओर घना जंगल, दूसरी ओर खेत और बीच में बिना किसी स्ट्रीट लाइट की कच्ची सड़क। ग्रामीणों के अनुसार, इस रास्ते पर कई बार बाघ देखे जा चुके हैं—कभी सड़क पार करते हुए, तो कभी मवेशियों पर हमला करते हुए।
वन विभाग के आंकड़ों के मुताबिक, गांव के आसपास के इलाके में 12 से 13 बाघों की मौजूदगी दर्ज की गई है। ऐसे माहौल में बच्चों का रोज़ स्कूल जाना एक बड़ी चुनौती बन गया था।
चार महिलाएं, एक मजबूत सुरक्षा घेरा
इसी खतरे को देखते हुए गांव की चार महिलाएं—किरण गेडाम, वेणू रंदये, रीना नाट और सीमा मडावी—आगे आईं और बच्चों की सुरक्षा की जिम्मेदारी खुद संभाल ली। इनका मकसद साफ़ था: गांव के बच्चे बिना डर के पढ़ाई जारी रख सकें।
गांव में करीब 200 लोग रहते हैं और यहां के 11 बच्चे सात किलोमीटर दूर मुधोली स्थित स्कूल में पढ़ने जाते हैं। सुबह 9:45 बजे बस आती है और शाम करीब 6:45 बजे बच्चों की वापसी होती है—जब चारों ओर घना अंधेरा फैल चुका होता है।
बाघों के साए में सुबह और शाम की पहरेदारी
हर सुबह ये महिलाएं बच्चों को गांव के चौक से बस स्टैंड तक ले जाती हैं। बच्चे बीच में चलते हैं और महिलाएं चारों ओर सुरक्षा घेरा बनाकर उनके साथ रहती हैं। बस स्टैंड पर भी बाघों की मौजूदगी की आशंका रहती है, इसलिए बस आने तक महिलाएं वहीं खड़ी रहकर निगरानी करती हैं।
शाम को हालात और भी खतरनाक हो जाते हैं। अंधेरी सड़क, जंगल की आवाज़ें और किसी भी पल बाघ के सामने आ जाने का डर। ऐसे में ये महिलाएं हाथ में टॉर्च और लाठी लेकर बस स्टैंड पहुंचती हैं, बच्चों को अपने बीच में घेरती हैं और उन्हें सुरक्षित गांव तक लाती हैं। रास्ते में वे टॉर्च की रोशनी से निगरानी रखती हैं, लाठियों से आवाज़ करती हैं, चिल्लाती हैं और आपस में बात करती रहती हैं ताकि कोई जंगली जानवर पास न आए।
बच्चों का डर और महिलाओं का हौसला
दसवीं कक्षा के छात्र सुशांत नाट बताते हैं कि एक बार उन्होंने गांव के पास बाघ को गाय का पीछा करते देखा था। डर के मारे सभी बच्चे गांव की ओर भागे और शोर मचाया। इसके बाद से बच्चों का डर और बढ़ गया था।
किरण गेडाम कहती हैं, – “रात के अंधेरे में बस स्टैंड से गांव तक 15 मिनट का पैदल रास्ता बेहद डरावना होता है। कई बार बाघ दिख जाता है, लेकिन हम बच्चों को नहीं बताते, ताकि वे और न डरें। गांव पहुंचने तक दिल जोर-जोर से धड़कता रहता है।”
क्यों खुद उठानी पड़ी जिम्मेदारी?
महिलाओं का कहना है कि उन्होंने वन विभाग से बच्चों के लिए सुरक्षा गार्ड देने की मांग की थी, लेकिन कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया। मजबूर होकर उन्होंने खुद ही बच्चों की सुरक्षा का फैसला किया।
किरण बताती हैं, – “बच्चे डर के कारण स्कूल जाना छोड़ने लगे थे। इसलिए हमने तय किया कि चाहे कुछ भी हो, हम अपने बच्चों और गांव के बाकी बच्चों को सुरक्षित स्कूल पहुंचाएंगे।”
वन विभाग से मांग और प्रशासन की प्रतिक्रिया
महिलाओं ने मांग की है कि गांव से बस स्टैंड तक सड़क पर बिजली की व्यवस्था की जाए, सुरक्षा गार्ड तैनात किए जाएं और उन्हें इलेक्ट्रिक स्टिक जैसी सुविधाएं दी जाएं, जिससे बाघों को दूर रखा जा सके।
वन विभाग ने अब इस पहल पर संज्ञान लिया है। मोहोर्ली वन रेंज अधिकारी संतोष थिपे ने बताया कि यह मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करने का एक सराहनीय उदाहरण है। ताडोबा-अंधारी टाइगर रिज़र्व के अंतर्गत आने वाले 105 गांवों में इस मॉडल को लागू करने की योजना है।
उन्होंने कहा कि इस काम में शामिल प्रत्येक व्यक्ति को एक हजार रुपये मानदेय दिया जाएगा। पूरी टीम को चार हजार रुपये मिलेंगे, साथ ही महिलाओं को इलेक्ट्रिक स्टिक, जैकेट और टॉर्च भी उपलब्ध कराई जाएगी।
साहस की मिसाल बनीं गांव की महिलाएं
सीतारामपेठ की ये चार महिलाएं आज सिर्फ अपने गांव की नहीं, बल्कि उन तमाम इलाकों के लिए प्रेरणा बन गई हैं, जहां शिक्षा और सुरक्षा के बीच रोज़ जंग चलती है। बाघों के डर के बावजूद बच्चों की पढ़ाई को प्राथमिकता देना, इन महिलाओं के साहस और सामाजिक जिम्मेदारी का जीवंत उदाहरण है।
(प्रस्तुति – सुमन पारिजात)



