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Soulmate: क्या सच में होते हैं ‘सोलमेट’? – प्रेम, विज्ञान और मनोविज्ञान किस तरह समझता है इसे

Soulmate:  क्या है ‘सोलमेट’ की सच्चाई? क्या है इस पर प्रेम, विज्ञान और मनोविज्ञान की गहराई..

वैलेंटाइन डे पर अक्सर यह ख्याल आता है कि कहीं न कहीं कोई ऐसा इंसान ज़रूर होगा जो हमारे लिए बिल्कुल सही है — जिसे हम “सोलमेट” कहते हैं। यह धारणा कि प्रेम केवल संयोग नहीं बल्कि नियति है, इंसानों को सदियों से आकर्षित करती रही है।

प्राचीन ग्रीस में प्लेटो ने कल्पना की थी कि इंसान कभी संपूर्ण प्राणी थे — चार हाथ, चार पैर और दो चेहरे वाले। उनकी चमक इतनी प्रबल थी कि ज़्यूस ने उन्हें दो हिस्सों में बाँट दिया। तब से हर आधा हिस्सा अपने खोए हुए दूसरे हिस्से को खोजता फिर रहा है। यही मिथक आधुनिक “सोलमेट” की अवधारणा को काव्यात्मक आधार देता है।

मध्यकालीन यूरोप में यह विचार “कोर्टली लव” के रूप में सामने आया। लांसलॉट और ग्विनिवर की कहानियाँ इस बात का प्रतीक थीं कि प्रेम अक्सर त्याग और संघर्ष से जुड़ा होता है।

पुनर्जागरण काल में शेक्सपियर जैसे लेखकों ने “स्टार-क्रॉस्ड लवर्स” की कहानियाँ लिखीं — ऐसे प्रेमी जिन्हें भाग्य ने मिलाया लेकिन परिस्थितियों ने अलग कर दिया। आधुनिक समय में हॉलीवुड और रोमांटिक उपन्यासों ने इस विचार को परियों की कहानियों जैसा बना दिया। लेकिन सवाल यह है कि विज्ञान सोलमेट्स के बारे में क्या कहता है?

मनोविज्ञान और समाजशास्त्र की दृष्टि

प्रोफेसर विरन स्वामी बताते हैं कि यूरोप में प्रेम की आधुनिक समझ मध्यकालीन कहानियों से आई। पहले प्रेम कई लोगों के साथ हो सकता था, लेकिन धीरे-धीरे यह धारणा बनी कि जीवनभर के लिए एक साथी चुनना चाहिए। औद्योगीकरण के बाद जब लोग अपने समुदायों से अलग होने लगे, तो वे एक ऐसे साथी की तलाश करने लगे जो उन्हें जीवन की कठिनाइयों से बचा सके।

आज के समय में डेटिंग ऐप्स ने इस खोज को “रिलेशन-शॉपिंग” बना दिया है, जहाँ लोग दर्जनों विकल्पों में से साथी चुनते हैं।

“सोलमेट ट्रैप”

प्रोफेसर जेसन कैरोल का मानना है कि इंसान जुड़ाव चाहते हैं, लेकिन “सोलमेट” की धारणा अक्सर जाल साबित होती है। उनका कहना है कि असली रिश्ता नियति से नहीं बल्कि मेहनत, समझौते और धैर्य से बनता है।

मनोवैज्ञानिक शोध भी यही दिखाता है कि जो लोग रिश्तों को “डेस्टिनी” मानते हैं, वे संघर्ष के समय जल्दी हार मान लेते हैं। जबकि “ग्रोथ” सोच वाले लोग कठिनाइयों के बावजूद रिश्ते को निभाने की कोशिश करते हैं।

“ट्रॉमा बॉन्ड” और गलतफहमी

लव कोच विकी पैविट बताती हैं कि कई बार जिसे हम सोलमेट समझते हैं, वह दरअसल “ट्रॉमा बॉन्ड” होता है। यानी पुरानी चोटों और अस्वस्थ पैटर्न की वजह से हम किसी व्यक्ति की ओर आकर्षित होते हैं। ऐसे रिश्ते हमें चिंता और असुरक्षा देते हैं, लेकिन हम उन्हें प्रेम समझ बैठते हैं।

जीवविज्ञान और गणित की भूमिका

शोध से पता चलता है कि हार्मोनल बदलाव और गर्भनिरोधक गोलियाँ भी आकर्षण को प्रभावित कर सकती हैं। यानी “द वन” का एहसास जैविक रूप से भी बदल सकता है।

गणितीय दृष्टि से, डॉ. ग्रेग लियो ने दिखाया कि हर व्यक्ति के लिए कई “वन” हो सकते हैं। उनके एल्गोरिद्म के अनुसार, रिश्ते स्थिर और संतोषजनक तब होते हैं जब दोनों साथी एक-दूसरे को प्राथमिकता देते हैं, भले ही वे पहले विकल्प न हों।

असली जुड़ाव

प्रोफेसर जैक्वी गैब के शोध से पता चला कि रिश्तों में सबसे महत्वपूर्ण चीज़ बड़े रोमांटिक इशारे नहीं बल्कि रोज़मर्रा की छोटी-छोटी देखभाल होती है – जैसे चाय बनाकर देना, कार गर्म करना या फूल तोड़कर लाना। यही छोटे काम रिश्तों को गहराई और स्थायित्व देते हैं।

विज्ञान बताता है कि “सोलमेट” की धारणा रोमांटिक है लेकिन वास्तविक रिश्ते मेहनत, समझ और रोज़मर्रा की देखभाल से बनते हैं। असली जुड़ाव नियति से नहीं बल्कि जीवन की चुनौतियों को साथ मिलकर पार करने से पैदा होता है।

(प्रस्तुति -सुमन पारिजात)

 

 

 

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