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Rani Nayki Devi: ये थी दूसरी रानी लक्ष्मी बाई – गुजरात की वीरांगना

Rani Nayki Devi: मध्यकालीन भारत एक अत्यंत गर्वशाली और प्रेरणादायक हिन्दू इतिहास है..इसमें एक नहीं, दो दो रानी लक्ष्मी बाई रही हैं जिनके बारे में बात नहीं होती..

भारतीय इतिहास की किताबों में अक्सर विदेशी आक्रांताओं की जीत का वर्णन अधिक मिलता है, लेकिन रानी नायकी देवी जैसी वीरांगनाओं का शौर्य कहीं दब कर रह गया। 1191 में तराइन के युद्ध से 13 साल पहले, गुजरात की इस राजपूतानी शेरनी ने मुहम्मद गोरी का वह हश्र किया था कि वह एक दशक से ज्यादा समय तक भारत की ओर आँख उठाने की हिम्मत नहीं कर सका।

एक ‘आसान लक्ष्य’ का भ्रम और गौरी की भूल

1178 ईस्वी में, जब मुहम्मद गोरी ने भारत की समृद्धि को लूटने के इरादे से गुजरात (अनहिलवाड़ा) पर आक्रमण की योजना बनाई, तो उसे लगा कि राह आसान होगी। उस समय गुजरात पर सोलंकी वंश का शासन था और राजा अजयपाल के निधन के बाद उनकी विधवा रानी नायकी देवी अपने छोटे पुत्र मूलराज द्वितीय की संरक्षिका के रूप में शासन संभाल रही थीं।

मुहम्मद गोरी ने सोचा कि एक ‘विधवा महिला’ और ‘छोटे बालक’ की सत्ता को कुचलना सरल होगा, लेकिन वह रानी के अदम्य साहस और युद्ध कौशल से अनभिज्ञ था।

1178 ई. का कयादरा युद्ध: रणनीति और शौर्य का संगम

रानी नायकी देवी केवल एक योद्धा ही नहीं, बल्कि एक कुशल रणनीतिकार भी थीं। उन्होंने अपनी हार मान लेने के बजाय दुश्मन को उसकी सबसे बड़ी कमजोरी पर वार करने की योजना बनाई।

रणनीतिक सूझबूझ

रानी जानती थीं कि गोरी की तुर्की घुड़सवार सेना खुले मैदान में घातक है। इसलिए उन्होंने युद्ध के लिए माउंट आबू की तलहटी में स्थित गदरारघट्टा (कयादरा) के दुर्गम पहाड़ी इलाके को चुना। यहाँ पहाड़ों और जंगलों के बीच गोरी की सेना अपनी गति और शक्ति खो बैठी।

रणचंडी का अवतार

युद्ध के मैदान में रानी ने जो किया, वह आज भी किंवदंती है। उन्होंने अपने नन्हे पुत्र को अपनी पीठ पर बाँधा, दोनों हाथों में तलवारें लीं और सेना का नेतृत्व करते हुए सीधे गोरी की सेना पर टूट पड़ीं।

मुहम्मद गोरी की यादगार हार

रानी के नेतृत्व में सोलंकी सेना ने तुर्की सेना का भीषण संहार किया। मुहम्मद गोरी अपनी जान बचाकर युद्ध के मैदान से इस कदर भागा कि उसने अगले 13 वर्षों तक फिर कभी गुजरात की सीमा में कदम रखने की हिम्मत नहीं की।

राजपूतानी शौर्य की मिसाल

यह युद्ध सिद्ध करता है कि भारतीय वीरांगनाओं ने न केवल जौहर की अग्नि में जलना सीखा था, बल्कि आवश्यकता पड़ने पर रणचंडी बनकर आक्रांताओं का मान-मर्दन भी किया था। रानी नायकी देवी का यह शौर्य पृथ्वीराज चौहान की विजय की नींव जैसा था।

(प्रस्तुति -अर्चना शेरी)

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