दराज साफ करते करते एक पुरानी किताब हाथ लग गई। जिल्द फट चुका था, गर्द जमा थी, सोचा इसे बदल दूं। जैसे ही जिल्द उतारने लगी, तभी एक धुंधली तस्वीर ने झांक कर मुझसे पूछ लिया- याद है कुछ ।
मेरी मुस्कान ने जवाब दिया- हां-हां याद है। शादी से पहले की बात है। मां ने तुम्हारी तस्वीर मंगाई थी और तुमने ईमेल से दो तस्वीरें भेजी थीं, जिसमें एक मेरे हाथ में थी। जिल्द जब उतरा तो एक पीला पड़ चुका पन्ना भी निकला, जिसमें कृष्ण बिहारी ‘नूर’ की गजल ‘नज़र मिला न सके….लिखी हुई थी।
यकीन नहीं होता कि जब पहली बार हम दोनों का आमना-सामना हुआ, तो दोनों की हालत कुछ एेसी ही थी…
नज़र मिला न सके उससे उस निगाह के बाद ।
वही है हाल हमारा जो हो गुनाह के बाद ।
मैं कैसे और किस सिम्त मोड़ता ख़ुद को,
किसी की चाह न थी दिल में, तिरी चाह के बाद ।
ज़मीर काँप तो जाता है, आप कुछ भी कहें,
वो हो गुनाह से पहले, कि हो गुनाह के बाद ।
कहीं हुई थीं तनाबें तमाम रिश्तों की,
छुपाता सर मैं कहाँ तुम से रस्म-ओ-राह के बाद ।
गवाह चाह रहे थे, वो मिरी बेगुनाही का,
जुबाँ से कह न सका कुछ, ‘ख़ुदा गवाह’ के बाद ।
(सोमा शर्मा)



