Poetry by Nivedita Rashmi: जीवन ने सिखाया जीना एक औरत को उन अनुभवों के साथ भी जो उसके लिये नहीं बने हैं, पढ़िये निवेदिता की संवेदनशील कलम से..
उसे देखा मैंने
पतझड़ में
बारिश होते हुए
गम के अंधेरे में
दिया बनते हुए।
गुलाब और गेंदे
के बीच वो
कोशिश करती रही
पारिजात बनने की
उसकी हँसी
फीकी कर देती
चिड़ियों की चहचहाहट
उसने सीखा था
कीचड़ में कमल होना
उसने सिखा था
ओस पी कर मोती होना
जाने अनजाने
लोग उसे पिरो लेते
अपने गले में
उसकी चमक में
कही छुप जाता घना अंधेरा।
वो लड़की धीरे-धीरे
औरत बनी थी !



