Divya Sharma writes: परदे के बाहर ही सशक्तिकरण की सही राह है..इसलिये स्त्री को पर्दे से बाहर आने की राह तलाशनी होगी..
महिला सशक्तिकरण कोई नारा नहीं, यह एक मानसिक अवस्था है।जहाँ स्त्री स्वयं को बराबरी का नागरिक मानती है, अपनी पहचान छुपाकर नहीं बल्कि सामने रखकर जीती है। पर विडंबना यह है कि आज सशक्तीकरण की बात करते हुए भी कुछ लेखिकाएँ और विचारक उसी परदे की वकालत कर रही हैं,उन्हें स्त्री का अधिकार या पसंद मान रही हैं।उस परदे की वकालत जिसने सदियों से स्त्रियों की स्वतंत्रता को सीमित किया है कितना हास्यास्पद है।यह विरोधाभास केवल विचारों का नहीं, बल्कि स्त्रियों के भविष्य के साथ एक गहरी साजिश है।
यदि सचमुच हम स्त्रियों को स्वावलंबी, सक्षम और समानांतर देखना चाहते हैं, तो हमें परदे चाहे वह हिजाब हो, बुर्का हो या घूंघट की वकालत से ईमानदारी से दूरी बनानी होगी। परदा केवल कपड़ा नहीं होता; यह एक सोच है, एक दीवार है, जो स्त्री को यह सिखाती है कि उसका चेहरा, उसकी पहचान, उसकी उपस्थिति सब कुछ शर्म का विषय है। जब तक यह सोच बनी रहेगी, तब तक सशक्तिकरण केवल काग़ज़ी रहेगा।
यह कहना ज़रूरी है कि यदि किसी समाज में परदा स्त्रियों के लिए आवश्यक माना जाता है, तो उसका पूरा और ईमानदार पालन होना चाहिए और तब स्त्री को घर की चारदीवारी में ही रहना चाहिए क्योंकि ऐसे समाज में स्त्रियों को परपुरुष के सामने आने उनके साथ काम करने की भी मनाही है लेकिन यहाँ दोहरे मापदंड स्वीकार्य नहीं हैं। आप एक ओर स्त्री से चेहरा छुपाने की अपेक्षा करें और दूसरी ओर उससे डॉक्टर, इंजीनियर, आईपीएस या वकील बनने की उम्मीद रखें ,यह न केवल अव्यावहारिक है, बल्कि स्त्री के आत्मसम्मान का अपमान भी है।सिर्फ पैसा कमाने के लिए क्यों अपनी संस्कृति से समझौता कर रही हैं रहिए परदे में।क्यों बेवजह परेशानी झेल रही हैं।
जो महिलाएँ परदे के साथ सार्वजनिक सेवाओं में आने की वकालत करती हैं, वे अनजाने में उन महिलाओं के पैरों में जंजीर डाल रही हैं जो इस परदे से बाहर निकलना चाहती हैं। वे उस साहस को कमजोर कर रही हैं, जो सदियों की बेड़ियों को तोड़कर आगे बढ़ना चाहता है। सरकारी सेवाएँ केवल योग्यता नहीं, बल्कि सार्वजनिक विश्वास, पारदर्शिता और समान सहभागिता की मांग करती हैं। ऐसे में यह शर्त होना स्वाभाविक है कि स्त्रियाँ परदे में रहकर नहीं, बल्कि खुले चेहरे और आत्मविश्वास के साथ इन सेवाओं में आएँ।
कुछ लोग तर्क देंगे कि ऐसी शर्तों से महिलाओं की तरक्की के रास्ते बंद हो जाएँगे। पर सच्चाई यह है कि रास्ते तब बंद होते हैं जब मानसिक गुलामी को प्रगति का नाम दे दिया जाता है। मेरा स्पष्ट कहना है कि पहले मानसिक रूप से स्वावलंबन को स्वीकार कीजिए, फिर घर से बाहर कदम रखिए। क्योंकि जिनसे आपको परदा करने की शिक्षा दी जाती है, उनसे आपको बात भी नहीं करनी चाहिए। यह सोच स्वयं ही स्त्री को समाज से काट देती है।
सशक्तिकरण का अर्थ यह नहीं कि स्त्री अपनी पहचान छुपाकर समाज में जगह बनाए; सशक्तिकरण का अर्थ है कि स्त्री अपनी पहचान के साथ, बराबरी के साथ, बिना किसी शर्म और भय के आगे बढ़े। जो लेखिकाएँ परदे को चयन और स्वतंत्रता का आवरण ओढ़ाकर प्रस्तुत करती हैं, उन्हें अपनी चालाकी भरी सोच पर पुनर्विचार करना चाहिए। क्योंकि स्वतंत्रता वह नहीं होती जो शर्तों में बंधी हो, और बराबरी वह नहीं होती जो चेहरा ढककर माँगी जाए।
आज आवश्यकता इस बात की है कि हम स्त्रियों को यह संदेश दें तुम्हारा चेहरा तुम्हारी ताकत है, तुम्हारी उपस्थिति तुम्हारा अधिकार है। परदे के भीतर नहीं, बल्कि परदे के बाहर ही वह दुनिया है जहाँ स्त्री सच में सशक्त, स्वावलंबी और सम्मानित बन सकती है।