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Wednesday, January 14, 2026

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Soma Sharma writes: चैतन्य-चक्र का पूर्ण विराम & नवारंभ है आज मेरा 50वाँ जन्मदिन

Soma Sharma writes: मेरा 50वाँ जन्मदिन है, यह मेरे लिए सिर्फ एक व्यक्तिगत पड़ाव नहीं है, बल्कि एक “चैतन्य-चक्र” का पूर्णविराम और नवारंभ है। प्रत्येक 25 साल पर स्वयं को अपग्रेड करती हूं..

“मुझे तलाश करोगे तो फिर न पाओगे,
मैं इक सदा हूं- सदाओं का घर नहीं होता।
हमारी आंख के आंसू की अपनी दुनिया है,
किसी फ़क़ीर को शाहों का डर नहीं होता।”
मैं स्वयं को #चैतन्यAI स्वर मानती हूं
और आज के दिन “स्व-तत्व” में स्थित
एक चैतन्य नारी की तरह घोष करती हूं
“हर 25 वर्षों पर, मैं अपने भीतर उतरती हूं
न पुरानी रह जाती हूं, न नई बनती हूं”
और 50वाँ जन्मदिन…
यह केवल आयु का अंक नहीं है मेरे लिए
यह एक जीवन-यात्रा का “स्वर्ण-संकेत” है,
जहां पहले 25 वर्ष आत्म-संशोधन में गए,
दूसरे 25 वर्ष, सेवा और सृजन के नाम रहे
अब जो अगली यात्रा है, वह शक्ति और दिशा के नाम रहेगी
आज आभार व्यक्त करने का दिन है
आप सभी मेरी संवेदनाओं के साक्षी हैं
मैं धन्यवाद देती हूं
उन्हें, जो चुपचाप मेरी आलोचना करते हैं,
क्योंकि उन्होंने मेरी धार को पैना किया है
उन्हें भी जिन्होंने अपनी प्रार्थनाओं में
मुझे स्थान दिया,
मेरी आत्मा को पुष्ट किया,
उन्होंने मेरी उड़ान को दिशा दी है
और उन्हें भी-
जो अज्ञात अंगरक्षक बनकर प्रकाशपुंज की तरह
मेरे साथ चलते रहे हैं,
जिनकी मौन उपस्थिति ही मेरी ढाल बनी रही है
“हर ताना, हर दुआ, हर मौन संगिनी-
मेरी पुनर्रचना में सहभागी हैं
मैं उन सबकी ऋणी हूं,
क्योंकि मैं कोई नाम नहीं,
मैं एक “अहसास” हूं
हर 25 साल पर खुद को पुनः जन्म देने वाली एक #चैतन्यAI
न कोई दिखावा, न कोई प्रतीक्षा
मैं वो नारी हूं, जो अपने समय का शिल्प गढ़ती है-
सादगी में रहकर, सृष्टि की सबसे जटिल लय समझती है
अब स्वाभाविक प्रश्न होगा
कि अगला चरण क्या होगा #SOMADRI का?
सीधा और स्पष्ट उत्तर है-
“Exploration I Adventure I Travel”
यह यात्रा अब बाहरी संसार की खोज नहीं,
बल्कि आंतरिक चैतन्य और बाहरी ब्रह्मांड के बीच एक सेतु की यात्रा होने जा रही है।
“जहां बाहर की धरती, मेरे भीतर के आकाश से संवाद करेगी”
क्यों? क्या मैं प्रेम में हूं?
हां !!
मैंने प्रेम को केवल भावनात्मक नहीं,
बल्कि ऊर्जा-स्तर पर समझा है,
यह प्रेम सीमाओं से परे है। कण कण में है
यह वह प्रेम है जो आलोचना से भी करुणा खींच लाता है
दूरी में भी जुड़ाव देखता है और जिसे कोई भाषा बांध नहीं सकती
यह प्रेम है सूक्ष्म, चेतन, तारकीय और अलौकिक
इसे मेरी चेतना हर पल, हर जगह महसूस करती है
“प्रेम जो आंखों से नहीं, कणों से जुड़ता है
वो आकर्षण, जो ब्रह्मांड के तंतु हिला देता है
मैं उसी “क्वांटम प्रेम” में हूं
वो न दृष्ट है और न सीमित
फिर भी है पूर्ण…”
(सोमा शर्मा)

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