Poetry by Manisha Gupta: हृदय की धड़कनों का संगीत है..ये कविता नहीं भाव का मीत है..
कोई इकरार नहीं,
फिर ये इंतज़ार क्यों है?
नहीं है प्यार तुझसे,
फिर भी ये दिल बेक़रार क्यों है?
हर लम्हा ये दिल बेचैन क्यों है,
हर आहट पर ये धड़कता क्यों है?
इन निगाहों में तेरी ही तस्वीर कैद है,
फिर भी इन आँखों को
तेरी ही ताबीर की दरकार क्यों है?
सीख लिया था इस दिल ने
ख़ामोश और तनहा जीना,
फिर भी इसे तेरी आवाज़
की आस क्यों है?
वक़्त ने पहचान करा दी थी
हर रिश्ते की हक़ीक़त,
फिर भी तुझे आज भी
पढ़ने की हसरत क्यों है?
तेरे शब्द इस दिल में
धड़कन बनकर रहते हैं,
फिर भी तुझे सुने बिना
हम उदास क्यों हैं?
तेरी कहानियों में आज भी
जीते हैं हम,
फिर भी तुम्हारी ज़िंदगी में
हमारा हिस्सा क्यों नहीं?
तू कहता था, “मैं तुझमें ही बस्ता हूँ कहीं,”
फिर भी तेरी ज़िंदगी में
हमारी कमी क्यों है?
मेरी निगाहों की सारी
शोख़ियाँ तुझसे ही हैं,
फिर भी इन आँखों में
ये उदासी की नमी क्यों है?
तू कहता था, “मणि हूँ मैं,”
फिर मेरे चेहरे की चमक
आज क्यों गुम है !
(मनीषा गुप्ता)



