Monalisa की हंसी का राज़ लोग सदियों से जानना चाहते हैं पर क्या है इस जादूई मुस्कान का राज़ कोई सही सही बता नहीं पाया है..
फ्लोरेंस की एक शांत सुबह थी। लियोनार्डो अपनी कार्यशाला में बैठे थे—खिड़की से आती हल्की धूप, हवा में रंगों की खुशबू, और सामने बैठी Lisa के होंठों पर एक तारीफ़-सी मुस्कान।
“हंसिए नहीं—बस… हंसी को थाम लीजिए,” लियोनार्डो ने कहा। Lisa ने आँखों में नरमी भर ली, होंठों के कोनों पर ज़रा-सा उजाला रुक गया—न पूरा हँसना, न पूरी गंभीरता। बस बीच की वो पतली-सी डोरी।
लियोनार्डो ने रंग उठाया और धुएँ जैसे नरम स्ट्रोक्स से चेहरे पर sfumato का जादू बुन दिया—जहाँ रेखाएँ गायब, बस रोशनी-छाया की फुसफुसाहट। उन्होंने होंठों के किनारों पर इतनी महीन परतें चढ़ाईं कि मुस्कान आँखों की तरफ़ देखते ही हल्की लगे, और होंठों पर टिकते ही गहरी हो जाए। जैसे मुस्कान कोई चंचल परिंदा हो—तुम देखो तो उड़ जाए, तुम हटो तो लौट आए।
सदियाँ बीत गईं। पेरिस के म्यूज़ियम में अब वही पेंटिंग टंगी है।
एक बच्चा आया—सीधे होंठों को देखने लगा। “मम्मी, ये तो मुस्कुरा रही है!”
कुछ देर बाद एक थका-हारा यात्री आया—उसकी निगाह आँखों पर ठहरी। “ये तो थोड़ी उदास लगती है…”
फिर एक चित्रकार आया—दूर हटकर, तिरछे कोण से देखने लगा। “कमाल है, मुस्कान जगह-जगह बदल रही है।”
हकीकत क्या थी?
रहस्य ये कि लियोनार्डो ने मुस्कान को एक भावना में बंद नहीं किया—उन्होंने उसमें खुशी की लौ भी रखी, थकान की छाया भी, यादों की नमी भी। रोशनी-छाया की चाल से उन्होंने ऐसा भ्रम रचा कि देखने वाला जो भी मन लेकर आए—मुस्कान वही बन जाए।
राज़ क्या है आखिरकार?
आख़िर में लगता है कि राज़ Monalisa में नहीं, हमारी नज़र में छुपा है:
तुम आँखों पर ठहरो तो मुस्कान शर्मीली, होंठों पर रुको तो प्यारी, और दूर से देखो तो रहस्यमयी।
यही उसकी जीत है—वो हर बार नई लगती है, और हर बार थोड़ी-सी तुम्हारी बन जाती है।
(प्रस्तुति -सुमन पारिजात)



